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ISSN 2292-9754

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10.26.2016


रामजी

सुबह के पाँच बजे थे मैं नहा धोकर तैयार हो गया और रामजी के चरण छूकर बिना कुछ खाए, जाने ही वाला था कि मेरी पत्‍नी उठ गई और बोली, "सुनो! आज दीपावली है आज कुछ भी हो मिठाई ज़रूर लाना और हो सके तो पटाखे भी। जब तक तुम नहीं आओगे तब तक बच्‍चे चैन से नहीं बैठेंगे।" मुझे भी याद था कल रात को घर में बचा-खुचा दाल व आटा भी ख़त्‍म हो गया था। आज शायद सारा दिन ये दोनों बच्‍चे कैसे जिएँगे क्‍या खाएँगे। ये सोचकर मेरा रंग उड़ सा रहा था। मेरी आँखें नम हो गईं थी। मेरी आँखों के आँसू पोंछते हुए मेरी पत्‍नी बोली, "चिंता क्‍यों करते हो ‘रामजी’ भली करेंगे आज दीपावली है, आज तुम्‍हें बहुत काम मिलेगा।"

मैं कोई बहुत बड़ा काम नहीं करता था। रेढ़ी खींचता था वो भी एक पट्टेदार रेढ़ी वाला, अगर दुकान पर कोई साहब मेज़, कुर्सी या अलमारी लेने आता तो उसके घर तक समान पहुँचाकर मैं उससे कुछ रुपये ले लेता और इसमें मेरा यह गुज़ारा चलता। कभी-कभी तीन-तीन दिन तक कोई काम भी नहीं होता था तब ऐसे ही हालात होते थे। अभी चार दिन पहले ही तो रेढ़ा टूट गया तो सौ रुपये उस पर ख़र्च हो गए। बस बचा-खुचा रुपया भी उसमें ख़र्च हो गया। अब हाथ में पैसा नहीं था और दीपावली का त्योहार। हम कभी-कभी सिर्फ चावल उबालकर भी खा लेते थे पर आज जब बच्‍चे गली में सबको अच्‍छे कपड़े पहने हुए पटाखे चलाते देखेंगे और मैं उन्‍हें खाना भी नहीं दे पा रहा यह सोचता हूँ तो मेरे साँसें थम सी जाती हैं और मैं मन ही मन रो देने के सिवाय कुछ भी नहीं कर सकता। बस फिर अपनी पत्‍नी से विदा लेकर मैं चला गया। दो-तीन घंटे तक चौराहे पर खड़ा रहा पर कोई रेढ़े वाले के पास नहीं आया शायद मेरी ज़रूरत किसी को नहीं थी क्‍योंकि आज सबके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं और छोटे-मोटे काम तो गाड़ी से हो जाते हैं।

अब 9 बज चुके थे। दुकान का खुलने का समय ओर मैं दुकान के लिए रवाना हो गया। यहाँ से दुकान पर जाने का एक घंटे का रास्‍ता था। दुकान पर पहुँचा तो अभी मालिक नहीं आया था। मैं इस दुकान पर अकेला ही रेढ़े वाला नहीं था। मेरी तरह दो और ऐसे रेढ़े वाले ओर थे और उनकी हालात भी मेरी तरह थी। दुकान खुली 11 बजे और शाम के चार बजे तक कोई ऐसा ग्राहक नहीं आया जो बड़ा सामान ख़रीदता। सारा दिन बच्‍चों की फ़िक्र में मुझे भूख नहीं लगी। आख़िरकार एक ग्राहक आ ही गया। जिसने बहुत बड़ी काँच की मेज़ ख़रीद ली और वह उसे रेढ़े पर अपने घर ले जाना चाहता था। रुपये भी पाँच सौ देने को तैयार था पर उसका घर बहुत दूर था इसलिए मैं तैयार हो गया। काँच की मेज़ बहुत बड़ी थी रेढ़े पर ले जाना आसान नहीं था और यहाँ से बीस किलोमीटर जाना कम से कम तीन या चार घंटे का रास्‍ता था। रास्‍ते भर मैं बहुत ध्‍यान से चलता रहा कहीं ये मेज़ टूट ना जाए। अगर ऐसा हुआ तो मैं तो हमेशा के लिए बंधुआ मज़दूर बन जाऊँगा। ये सोचकर मैं काँप जाता था।

आख़िरकार रात 9 बजे मैं मेज़ के मालिक के घर पहुँच गया। इस घर का मालिक और मालकिन पूजा कर रहे थे। आज दीपावली जो थी, थोड़ी देर मुझे रुकने को कहा गया। मैं वहीं रुक गया और इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में ही मेरा मन अपने घर के बारे में सोचने लगा मैं तो घर में कुछ भी नहीं छोड़ के आया था। बच्‍चे शायद भूख से बिलख रहे होंगे और वो भी दीपावली के दिन, बार-बार मेरे आने की आहट शायद उन्‍हें थोड़ी देर के लिए तसल्‍ली दे देती होगी, मेरी पत्‍नी पूजा के लिए खाली थाली लिए भगवान के सामने बैठी होगी और उसकी आँखें नम होंगी ये सोचकर मेरी आँखे भी नम हो गईं। जहाँ मैं बैठा था वहाँ से दस मीटर दूरी पर एक ओर बहुत बड़ी लकड़ी की मेज़ थी और वहाँ पर बड़ी-बड़ी थालियों में भरपूर मेवा व मिठाई रखी हुई थी। शायद यह बच्‍चों के लिए रखी हुई थी जिनसे बच्‍चे अपने आप मिठाई का सेवन कर सकें और माँ-बाप को कोई कठिनाई ना हो। दो बच्‍चे बार-बार वहाँ से काजू ले जा रहे थे। भगवान भी ख़ूब है कहीं पर ढेरों और कहीं पर एक मुट्ठी चावल भी नहीं, रह-रहकर मैं यह सोच ही लेता था।

रात के 10 बज चुके थे। पूजा ख़त्‍म होने के बाद मालिक साहब बाहर आए और एक मिठाई का टुकड़ा मुझे प्रसाद के रूप में दिया। मैंने मेज़ रखने के लिए कहा तो वह बोले! थोड़ी देर रुको। मैं नौकरों को भेजता हूँ वह बच्‍चों के साथ पटाखे छोड़ रहे हैं। मेज़ रखवाते-रखवाते रात के 11 बज गए। उसके बाद रुपये लेने में और रास्‍ते में भी दो घंटे और लग गए। रात को 1 बजे मैं घर पर पहुँचा पूरे रास्‍ते मिठाई की और पटाखे की दुकान ढूँढता रहा शायद कोई दुकान खुली हो जिससे मैं भी बच्‍चों के लिए कुछ ले जाऊँ, पर दीपावली की रात को दुकानें थोड़ी और जल्‍दी बंद हो जाती हैं। आख़िर मैं घर पर पहुँच गया। दरवाज़े पर पहुँच थककर वहीं बैठ गया मेरी हिम्‍मत नहीं हो पा रही थी घर के अंदर जाने की। बार-बार यह सोचकर कि बच्‍चे भूखे ही सो गए होंगे। पत्‍नी पुरानी साड़ी में खाली थाली लिए आँसू बहाते-बहाते कब तक बच्‍चों को झूठी तसल्‍ली देती रही होगी और मैं यह सोचकर बहुत तेज़ पर बिना आवाज़ के रोने लगा, जितनी तेज़ मैं रो रहा था शायद सभी पटाखे की आवाज़ उससे कम होगी। पर मैंने मुँह पर हाथ रखा हुआ था और सिर्फ़ हिचकियाँ ही मुझे आ रही थीं। तभी मेरी पत्‍नी ने दरवाज़ा खोला और मुझे रोते देख कर वो भी रो पड़ी। अब मुझे यक़ीन हो गया कि आज का दिन ‘रामजी’ ने हमारे लिए सबसे ख़राब दिन रखा। तभी मैंने उसे 500 रु. का नोट दिखाया और कहा कि हम कल दीपावली मनाएँगे मेरे पास रुपये हैं। हम... ज़रूर... ज़रूर...! बस मैं ये ही कह पाया और उसके साथ लिपट गया।

अब हम अंदर आ चुके थे और मैं रामजी का बार-बार शुक्रिया अदा कर रहा था। रामजी के राज में मैं कौन होता हूँ अपने बच्‍चों को सुख और ख़ुशी देने वाला। वो ख़ुद ही हर इंसान का ध्‍यान रखने वाले हैं। मेरी पत्‍नी ने बताया – मेरे जाने के बाद हमारे पड़ोसी के भाई जिनकी नई-नई शादी हुई थी, वह घर पर आए और मिठाई का डिब्‍बा दे गए। क्योंकि वह पक्‍के चपरासी सरकारी नौकरी में हो गए थे। वह बहुत ही ख़ुश थे और उन्‍होंने इतने पटाखे ख़रीद रखे थे कि वह सारा दिन उन पटाखे को नहीं छोड़ सकते थे। इसलिए हमारे बच्‍चों ने दिन भर उनके साथ पटाखे छोड़े और वहीं पर खाना भी खाया। उनकी दी हुई मिठाई से भगवान की पूजा हुई और दो घरों में मिठाई भी दी और कुछ घरों से पूरी और मिठाई भी आई जिसे मेरी पत्‍नी ने मेरे लिए सँभालकर रख दिया। बच्‍चे सारा दिन पटाखे व मिठाई खाते रहे और रात को थककर गहरी नींद में सो गए। मेरी आँखों से ख़ुशी के आँसू आने लगे। मैं सोचता रहा कि शायद मैं कमाकर लाऊँगा और तब बच्‍चे कुछ मीठा खाएँगे और पटाखे चलाएँगे, पर मुझे ये नहीं मालूम था कि सबका परमपिता परमात्‍मा अपने आप सबके अच्‍छे और बुरे का ख़्याल रखता है और लोग बेवजह परेशान होते रहते हैं। वाह! रामजी, आँसू मेरी आँखों से आ रहे थे, पर मेरी आत्‍मा ख़ुश थी। मैंने मिठाई का वो टुकड़ा जो मुझे प्रसाद में मिला था अपनी बँधी गठरी से निकाला और आधा अपनी पत्‍नी को दिया और आधा ख़ुद खाया अब मुझे कल की कोई चिंता नहीं थी रामजी है ना।


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