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ISSN 2292-9754

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03.24.2015


मौन मुखर!

कैसे मन की अगन बुझे
राख में शोले, जलन तुझे
झुलसी लपटें क्यों सह कर
                   मौन मुखर!
दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले
साँसे चुप-चुप क्यों डर कर
                   मौन मुखर!
नभ-मण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन
मानव आहें भर-भर कर
                   मौन मुखर!
भाव भरी कविता गढ़ कर
सुर-लय की सीढ़ी चढ़ कर
दिव्य साधना में गल कर
                   मौन मुखर!
मौन शून्य से निकली सृष्टि
ब्रह्म-ज्ञान की अनुपम दृष्टि
मोक्ष-द्वार पर पहुँचेगा नर
                  मौन मुखर!
जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली
प्राणो के स्वर हुये मुखर
                   मौन मुखर!


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