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विदाई
गीतिका गोयल
एक कली
सुंदर, मनमोहक, अधखिली थी
माली की
स्नेहिल छाया में पली थी
डाली पर
झूम-झूमकर गीत गाती थी
हँसती थी खिलखिलाती थी
अजीब-सी मादकता थी
उसकी सुगंध में
सभी को उसकी ओर
बरबस ही खींच लाती थी
अपने पौधे की हर शाख,
हर पत्ती उसे बेहद प्यारी थी
वो क्या जाने दुनिया क्या है-
उसकी दुनिया तो
छोटी-सी वह क्यारी थी
बहुत सुंदर था
उसका छोटा-सा संसार
उसे मिला था
साथियों का असीम प्यार
सुंदर, मनमोहक, अधिखली थी
माली की स्नेहिल छाया में पली थी
सोचती थी-
ऐसे ही रहूँ
साथियों के दुखों को
प्यार के आँसुओं से धोती
यूँ ही रहूँ अपनी क्यारी में
मुस्कुराहटों के बीज बोती
-पर सोचने से कभी मन की बात हुई है
जो अब होती?
एक फूलवाली को
उसकी सुंदर छवि भा गई
चली आई माली के पास
माँगने
उस नाजों की पली को
सुंदर, मनमोहक, उस अधिखली कली को,
और माली-
जैसे मौन ने
उसके शब्दों के सारे
पृष्ठ धो डाले,
सोचता था-
कैसे तो ‘ना’
कहे
और कैसे
अपने हृदय के टुकड़े को
किसी दूसरी झोली में डाले।
लेकिन वह जानता था
कि नहीं रखा जा सकता
कली की सुगंध को बाँधकर
आज नहीं तो कल
उसे जाना ही होगा
क्यारी की सीमाएँ लाँघकर।
तो फिर वही हुआ
जो सदा से होता आया है-
क्योंकि
यही दुनिया की रीत है,
माली को हमेशा माननी पड़ती है हार
क्योंकि इस हार में भी
उसकी जीत है।
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