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02.25.2007
 

समुद्र आँखों का
गीतिका गोयल


समुद्र आँखों का
जब मन में चीत्कार उठती है
और शब्दों को
अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मिलता
उन बेबस पलों में
आँखें सब कुछ कह देती हैं ...
चाहे, अनचाहे ...
जैसे कि कोई समुद्र उमड़ पड़ा हो
अंदर ...
उन पलों में
प्यार के दो शब्द
उन चंद्र-किरणों के पर्याय बन जाते हैं
जिनके पड़ते ही
समुद्र में तूफ़ान-सा उठता है
और लहरें
सारी सीमाएँ तोड़कर
दौड़ उठती हैं
किनारों की ओर
इस समुद्र को अंदर समेट पाना
फिर बस में नहीं रहता।
लेकिन इस समुद्र का
बह जाना ही ठीक है शायद
इसीलिए मन खोल देता है
चक्षु-द्वार
और लहरों को
छू लेने देता है
वे रेतीले किनारे
जिन पर
बाद में छूट जाते हैं
चमचमाते हुए -सीप-
विश्वास के
और एक बार फिर मैं
समेट लेती हूँ वे सीपियाँ
अपने सबसे अमूल्य
खजाने की तरह!