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ISSN 2292-9754

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09.30.2014


सिला

यहाँ मुहब्बतों की तूँ बात न कर, यहाँ चाहतों का भी सिला नहीं।
यहाँ जल गया मेरा आशियाँ, मगर मुझको किसी से गिला नहीं।

यहाँ दर्द ए दिल मैं न कह सका, यहाँ लफ्ज़ भी जैसे गुम से हैं।
यहाँ शब् ए वस्ल भी खिज़ां की है, यहाँ ख़ुशनुमा सी हवा नहीं॥

किसी राह पर तो किसी मोड़ पर, सभी चले गए कभी छोड़ कर।
कभी कोई शख़्स यहाँ दिखा नहीं, कि जिसको ग़म मिला नहीं॥

सभी कहते रहे कि हम तुम से हैं, हमें वास्ते भी तेरे गम से हैं।
मैं हाल ए दिल क्या बयाँ करूँ, कभी दुआ नहीं कभी दवा नहीं॥

कभी दोस्ती में यहाँ दुश्मनी, तो कभी दुश्मनों से दिखी दोस्ती।
वहाँ दुश्मनों में ग़र कलाम न था, तो यहाँ दोस्तों में वफ़ा नहीं॥

यूं तो लाख दर्द मेरी जुबां पर हैं, मगर सुनते वो भी कहाँ पर हैं।
दिल ये चाहता था कि कह भी दूं, मगर मैंने किसीसे कहा नहीं॥

जब दर्द ये हद से गुज़र गया, किसी कोने में जा कर ठहर गया।
बिना इसके जीना मुहाल हुआ, मेरा गम भी गम सा रहा नहीं॥

जो तेरी अंजुमन में शाम हो, वहीँ किस्सा ए अंजुम तमाम हो।
तेरी बांहों में मेरा निकले दम, मैं न कह सकूं तूँ हमनवा नहीं॥


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