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ISSN 2292-9754

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03.05.2016


मज़हबी

सजदे में सर, सजदे में नहीं ज़िन्दगी तो क्या।
कुछ इस तरह होती है मेरी, बन्दगी तो क्या॥

शब्दों में कान, कानों में शब्द हुआ नहीं मेरा।
क़ाबिले-पेश न रही, दिल की कली तो क्या॥
शब्द = भजन; क़ाबिले-पेश = अर्पण-योग्य

होना था मश्ग़ूल-ए-हक़, मगर हो क्या गया।
सू-ए-ज़न ही फिर रही, मेरी बेख़ुदी तो क्या॥
मश्ग़ूल-ए-हक़ = सत्य के लिए रत; सू-ए-ज़न = अविश्वास, संशय, पक्षपात

मानिन्द-ए-बर्क-ए-फ़लक़, आया गया यहाँ।
इक पल न रही आपसे ये आशिकी तो क्या॥
मानिन्द-ए-बर्क-ए-फ़लक़ = आसमानी बिजली की तरह

जाना नहीं माना नहीं, 'अंजुम' को ग़म बड़ा।
यूँ कहता रहूँ मैं हो गया हूँ, मज़हबी तो क्या॥


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