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ISSN 2292-9754

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06.30.2014


धर्म और धर्मांधता के बीच

जिधर देखो लोग धर्म के लिए कुर्बान होने को आतुर हैं। सारी दुनिया धर्म के पीछे पागल है। मार्क्स ने कहा था, "धर्म अफीम है जिसे खाकर लोग ऊँघ रहे हैं।" मुझे लगता है यह बात मार्क्स के समय में भले सटीक रही हो पर आज नहीं है। मेरी दृष्टि में यदि इसे वे अफ़ीम के बजाय धतूरा कहते तो शायद आज के लिए भी अधिक सटीक होता। धतूरे और धर्म के चाल-चलन और चरित्र काफ़ी मिलते-जुलते हैं। इतना ही नहीं इनमें 'ध' वर्ण की एक से अधिक बार आवृत्ति से अनुप्रास भी बहुत सुंदर बनता है। धतूरा भी मुफ्त में मिल जाता है और धर्म भी। धतूरा खाकर पगलाए हुए लोगों को भी मैंने अपनी आँखों से देखा है और धर्म के पीछे पागल हुओं को भी। दोनों विवेक शक्ति खो देते हैं और लगभग एक-सी हरकतें करते हैं। वे कहीं भी और किसी को भी अपनी धर्मांधता का शिकार बना सकते हैं। घर-घर, द्वार-द्वार जा-जा कर या सड़कों पर उतरकर नंग-नाच कर इंसानियत को शर्मसार कर सकते हैं। हज़ारों निर्दोषों, मासूमों को समूह में निर्वस्त्र कर गोलियों से भून या बम धमाकों से उड़ा (नरसंहार कर) उनके रक्त से स्नान कर पवित्र धर्मध्वजा फहरा सकते हैं।

चीन को छोड़ दें तो सारी दुनिया छान मारने पर भी मुश्किल से एक करोड़ लोग भी न मिलेंगे जो धर्म के विरोधी हों। कोई न कोई धर्म प्रायः हर इंसान की आस्था का केंद्र होता ही है। जिस धर्म के परिवेश में हम बचपन से पले-बढ़े होते हैं, वही हमें सबसे अच्छा लगता है। इसपर हम ज़रा भी विचार नहीं करते कि "धर्मों ने हमें दिया क्या है?" लेकिन हम धर्म के नाम पर अपना सब कुछ दे देने में खुशी अनुभव करते है। जिसके पास बहुत कुछ है वह भी और जिसके कुछ भी नहीं है दोनों अपने को धर्म के नाम पर लुटा देने पर तुले हैं। जिसके पास बहुत कुछ है वह साईँ बाबा और तिरुपति बाला जी को करोड़ों के हीरे ज़वाहरात जड़े मुकुट पहनाते हैं और जिनके पास कुछ भी नहीं है वे अपने बच्चों की फीस और किताबों के पैसे ही चढ़ा आते हैं। "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।" किताबी बातें हैं। किताबों में ही शोभा देती हैं। अगर मज़हब हमें आपस में बैर रखना नहीं सिखाता है तो और कौन सिखाता है? परस्पर प्यार बढ़ाने के बजाय लोगों ने धर्म बढ़ाए। धर्म बढ़े तो बँटवारे हुए। बंटे हुए लोगों ने अपने-अपने खाने बनाए। उन्हें दूसरों से अलग रखने के लिए अपने अलग निशान और झंडे अपनाए । झंडों की सुरक्षा के लिए डंडे जुटाए। इन झंडों-डंडों के साथ अपने-अपने लोगों की संख्या को बढ़ाने के लिए दूसरों के समुदायों को तोड़ना शुरू किया। यहीं से दुश्मनी शुरू हुई। यह दुश्मनी कभी घटी नहीं उलटे बढ़ती ही चली गई। धर्म की इसी नब्ज़ को पकड़ते हुए कविवर बच्चन ने कहा था- "बैर कराते मंदिर-मस्जिद मेल कराती मधुशाला।"

सबसे अधिक जानें धर्म के मामलों में उठे विवादों में ही जाती रही हैं। क्रूसेड, ज़ेहाद या धर्मयुद्ध बस नाम के धर्म युद्ध होते हैं। यथार्थ में तो ये ज़्यादातर अधर्म पर ही लड़े जाते हैं। जीवन के सारे संस्कार इन्हीं धर्मों की बपौती बन गए हैं। इनके रहते कोई न तो अपने ढंग से जी सकता है और न ही मर सकता है। धर्म से बाहर जाकर जीवन साथी तक चुनने की छूट नहीं। जिसने भी यह छूट लेने की कोशिश की उसके प्राण संकट में पड़े। अभी हाल में एक देश की गर्भवती युवती को न्याय मूर्तियों ने केवल इसलिए मृत्युदंड की सज़ा सुनाई की उसने ग़ैर धर्म के युवक से प्रेम विवाह कर लिया था। उन न्याय की मूर्तियों से यह कोई पूछने वाला नहीं कि क्या उसने जो किया वह उन न्यायमूर्तियों ने नहीं किया है? क्या उनकी पत्नियाँ गर्भवती नहीं हुई हैं? क्या माँ बनना पाप है? अगर यह पावन सृष्टि पाप है तो क्या उस पाप को इस युवती ने अकेले संपादित किया है? उस युवक को भी इन्होंने मृत्युदंड क्यों नहीं सुनाया जो इस सृजन के पाप में आधे का हिस्सेदार है?

किसी भी धर्मोन्माद को बड़े-बड़े उपदेशक बड़ी चालाकी से धर्मान्धता कहकर धर्म को उससे बाहर कर लेते हैं। यह केवल शब्दाडंबर है। यदि इसके मर्म तक पहुँचा जाए तो पता चलेगा कि व्याख्या को भेद को छोड़कर दोनों में कोई भेद नहीं। यदि ऐसा न होता तो धर्म की रक्षा के लिए कभी भी तोप और तलवार की कोई ज़रूरत ही न पड़ती। अपने देश भारत में गुजरात इससे उबरा तो इसका सबसे बड़ा दंश उत्तर भारत का पश्चिमी भाग अभी तक झेल रहा है। भारत ही नहीं सारी दुनिया के देश किसी न किसी रूप में इसके दंशों को झेल रहे हैं। करुणा, दया और परोपकार की मूल प्रवृत्तियों के आधार पर अपना धंधा चलाने वाले धर्म ज़रा-ज़रा-सी बातों पर आक्रामक हो उठते हैं। उस समय तो इनकी क्रूरता के आगे बड़े-बड़े अधर्मियों के कृत्य बौने हो जाते हैं। बच्चों और अबलाओं तक को निर्ममता से मौत के घाट उतारा जाता है। इनकी बर्बरताओं के अवशेष के रूप में राख हुए घर-बार और बुरी तरह जली, कटी तथा झुलसी हुई लाशें इनके असली चरित्र का चित्रण करती हुई हर वारदात के बाद प्रायः देखने को मिल जाती हैं। अभी ईराक के ताज़ा घटनाक्रम में चरमपंथी लड़ाकों के द्वारा अपलोड किए गए फोटो यह दर्शाते हैं कि क्या इंसान इस हद तक भी बर्बर हो सकता है कि हिंस्र से हिंस्र पशुओं के झुण्ड भी शर्मिंदा हो जाएँ और आश्चर्य कि इसके बावज़ूद वह गर्व के साथ अपने को धार्मिक भी कह सकता है?

आतंकवाद वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या है। मानवता के सामने यह बड़ी जटिल चुनौती बनकर खड़ा है। इस समस्या की जड़ों को तलाशा जाए तो शायद इसको जन्म देने से लेकर उसको पालने-पोसने तक के कर्म में मूलतः धर्म ही मिलेंगे कोई और सामाजिक संस्था नहीं। क्या इस समस्या के समाधान के लिए कोई नया धर्म पैदा होगा? बहुत संभव है कि ऐसा ही हो। हो यह भी सकता है कि उस नए धर्म को जन्म देने वाले नेता के अनुयायी फिर नए गुटों में तब्दील हो जाएँ और उनमें भी अपने-अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए खूनी संघर्ष हों। यह धर्म भी पुराने धर्मों के ढर्रे पर बहुत जल्द चलना शुरू कर सकता है।
हर धर्म की ज़ुबानी और कागज़ी दोनों भाषाओं और परिभाषाओं में इंसान और इंसानियत ही केंद्र में होते हैं। इसके बावज़ूद इन्हीं धर्मों के इशारों पर सबसे ज़्यादा अन्याय इंसानों के प्रति ही होता है। यह भी कम आश्चर्यजनक ही नहीं है कि किसी भी धर्म में निंदा सुनने और सहने की शक्ति बिल्कुल नहीं है। धर्म के विरुद्ध किसी की ज़रा भी ज़ुबान खुली नहीं कि वह धर्मी से अधर्मी और काफ़िर। जो बीते कल तक धर्म ध्वजा वाहक हो आने वाले कल को वही उस धर्म ध्वजा के झुक जाने के ज़ुर्म में चौराहे पर फाँसी के फंदे पर लटकाया जा सकता है। कितना क्रूर है यह विधान। क्या इसे धर्म कहा जा सकता है? "धारयित्यर्थे धर्मः" में जिस धर्म के धारण की बात है, यह धर्म कुछ-कुछ मेरी समझ में आता है क्योंकि इसके मानवता के धारण की धारणा साधारण नहीं असाधारण है। नितांत मानवीय है। यह मानवता किसी मानव या मानवी में ही सुरक्षित रह सकती है, ईंट-गारे से बने धर्म-स्थलों में नहीं। इस सत्य के बावज़ूद यथार्थ के धरातल पर धर्मों में इंसान का व वज़ूद नगण्य है। कागज़ की पुस्तकों और ईंट-गारे के पूजा स्थल को धर्मों में जो स्थान है, वह हांड-मांस के सजीव इंसान को नहीं। वहाँ सजीवों की अपेक्षा इन निर्जीवों के प्रति संवेदनशीलता का परिणाम यह है कि शायद ही किसी धर्म ग्रंथ में यह लिखा हो कि उसकी निंदा करने वाले किसी इंसान को दंड न दिया जाए। उलटे उसे अधर्मी और काफ़िर करार देकर मौत के घाट उतारने में उन्हें सबाब दिखता है। इंसान और इंसानियत को समर्पित पूजास्थलों के भीतर भी इसी इंसान का खून बहता हुआ देखा जा सकता है। क्या यही है वह धर्म-धारणा?

धर्म के लिए मर-मिटने का आलम यह है कि आत्मघाती दस्तों में शामिल होने के लिए लंबी-लंबी कतारें हैं। ये लाइनें यह दिखाती हैं कि धर्म का इनको कितना समर्थन मिला हुआ है। आत्मघात में निशाना इंसान ही होते हैं। खुद के साथ-साथ और इंसानों की हत्या किस कोटि की और कौन-सी धार्मिकता है? क्या दूसरे धर्म या जाति के व्यक्ति की हत्या किसी मानव का धर्म है? हिंसा किसी भी धर्म के मुख्य सिद्धांत में नहीं है। फिर ऐसा क्यों है कि धर्म के लिए आत्मघातियों के कृत्यों पर निंदा का कोई स्वर किसी भी धर्मस्थल से नहीं फूटता। ये कैसे धर्मं हैं जिनकी रक्षा तीर, तलवार, तोप और स्वचालित हथियारों से ही की जा सकती है। केवल जैन धर्म है जिसमें हिंसा का स्वर सामान्य रूप से सुनने को नहीं मिलता। पहले बौद्ध धर्म भी अपनी असीम करुणा और अहिंसा के उच्चतम आदर्शों के साथ अन्य धर्मों के लिए आदर्श पथ प्रदर्शक था। इसके इसी आदर्श से प्रभावित होकर च्रक्रवर्ती सम्राट अशोक ने हिंसा के हेतु युद्ध को हमेशा-हमेशा के लिए त्याग दिया था। अभी हाल में मस्जिद में नमाज़ पढ़कर आ रहे लोगों पर बौद्धों के द्वारा किए गए आक्रमण की श्रीलंका में घटित घटना और गत वर्षों में म्यानमार में हुए बौद्ध और मुस्लिम संघर्ष यह दर्शाते हैं कि बौद्ध धर्म ने भी अहिंसा के साथ-साथ हिंसा से भी अपनत्त्व बढ़ाना शुरू कर दिया है। यह हिंसा घर से लेकर बाहर तक फल-फूल रही है। जीव-जंतुओं को भोजन का हिस्सा बनाना, उन्हें चटखारे ले-लेकर खाना और मुँह पोंछकर अपराह्न सत्र में अहिंसा भर भाषण देना मुझे बिल्कुल नहीं रुचता। जब कोई ऐसा करता है तो मुझे लगता है यह ढोंग कर रहा है। यह ढोंग ही धर्मों के हिंसक चरित्र के लिए ज़िम्मेदार है। यह हिंसा और अनेक रूपों में समाज में व्याप्त है।

प्रायः हर धर्म के व्यक्तियों के घर में माँ-बाप द्वारा और विद्यालय में शिक्षकों द्वारा बच्चों को पीटा या मानसिक यंत्रणा दिया जाना हिंसा नहीं तो और क्या है? इस तरह अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो प्रायः हर धर्म में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा का यत्किंच समावेश अवश्य है। "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ।" जैसे मंत्रोच्चार के साथ धर्म की आड़ में की गई हिंसा भी चाहे वह बलि या क़ुर्बानी के रूप में ही क्यों न हो ग्राह्य नहीं हो सकती।
किसी भी धर्म में किसी भी तरह का छोटी-बड़ा कोई नुक्स निकालते ही टिप्पणी करने वाले के प्रति तलवारें निकल आती हैं। कभी असली टिप्पणीकार नहीं मिलता है तो उसके जैसे वेश, परिवेश और विचार धारा वाले पर ही रोष निकाल लिया जाता है। भले ही इसमें कोई परिवार अनाथ क्यों न हो जाए। यह आचरण देश, कालातीत है। इसमें पढ़े-लिखे, सभ्य-असभ्य का भेद भी मिट जाता है। यह केवल पुणे में ही नहीं अमेरिका में भी घट सकता है। ओसामा जैसे वेश वाले सिक्ख अमेरिका जैसे विकसित देश तक में भी केवल इसलिए शिकार होते हैं कि इनके सर पर ओसामा जैसे साफ़े (पगड़ियाँ) थे। गैर जाति, धर्म या मुल्क की क्या बात करें अपनी ही दिल्ली में हज़ारों सिक्ख इस लिए मौत के घाट उतार दिए गए कि इंदिरा गाँधी की हत्या करने वाले सतवंत और बेअंत सिक्ख थे। इस पर एक बड़े नेता की टिप्पणी कि कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो हलचल होती ही है। इसपर विद्वानों की चुप्पी के पीछे भी धर्म का ही हाथ है। दिल्ली में ही एक और हत्या हुई थी। इससे भी बड़ा पेड़ गिरा था। वह इतिहास का बरगद कोई और नहीं बापू थे लेकिन उनकी हत्या की प्रतिक्रिया में एक भी हत्या नहीं हुई थी। इसका कारण गोडसे और बापू दोनों के धर्मों का एक होना था। यदि वहाँ भी कोई बेअंत होता तो मार-काट का जो बेअंत सिलसिला चलता उससे पूरी यमुना नीली के बजाय लाल हो सकती थी। एक ही कृत्य अलग-आलग कोणों से व्याख्यायित होकर कहीं धर्म और कहीं अधर्म हो जाता है। धर्म की निरर्थक और नकारात्मक भूमिका का इससे बड़ा प्रमाण और प्रत्यक्ष उदाहरण दूसरा क्या हो सकता है?
धर्म-पालन और धर्मांधता के बीच अंतर न कर पाने वाले प्रायः यही भूल जाते हैं कि धर्मों ने हमें ठगा है। प्रेम कहकर घृणा थमा दी है। अहिंसा के नाम पर हिंसा का प्रसाद बाँट-बाँटकर हमें जो नहीं देना था वही दिया है। जब तक यह अंतर समझ में नहीं आएगा, धर्मान्धता भी धर्म के समानान्तर यात्रा करती रहेगी। इसी भेद की समझ के अभाव में धर्म के संबंध में समाज में व्याप्त रूढ़ियों पर किसी भी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी करने वाले को भले ही वह कितना बड़ा धर्म पूजक क्यों न हो उसे एक राय से अधर्मी कहकर धर्म से निर्दयता पूर्वक बहिष्कृत करने का पवित्र धर्म(?) दुनिया भर के धर्म बड़ी मुस्तैदी से निभाते रहेंगे। इन्हीं धर्मों और इनके संरक्षकों और स्वार्थ साधकों ने धर्मों के भीतर भी भेद करके अलग-अलग तंबू गाड़ लिए हैं। कुछ नहीं तो हर धर्म के कम से कम दो धड़े तो हो ही गए हैं। इन धड़ों के सिद्धांत समान रहे पर व्याख्याएँ बदली-बदली हैं। सिद्धांत को बदलकर अपने अस्तित्त्व को संकट में डालने के बजाय हर विभाजक ने पहले वाले से अपने को पुरोगामी बताने के लिए कुछ पूजा पद्धतियाँ बदलीं और कुछ आचार-विचार और नई धर्म-ध्वजा फहरा दी।

विभीषण के द्वारा रावण को या सुग्रीव के द्वारा बालि को मरवाने की बात हो या फिर कौरव-पांडव युद्ध। इनमें विनाशक की भूमिका में कोई पराए नहीं अपने ही रहे हैं। सुकरात और मीरा को ज़हर के प्याले पकड़ाने और ईसा मसीह को सूली देने वाले या कर्बला पर हसन-हुसैन के साथ हज़ारों को कफ़न उढ़ाकर क़यामत तक की नींद सुलाने वाले हाथ भी किसी ग़ैर के नहीं अपनों के ही रहे होंगे। यह कैसा अपनापन है जो इस सीमा तक पराया बना देता है कि अपने कलेजे के टुकड़ों तक का जीवन लेने से गुरेज़ नहीं रह जाता और यह अधर्म भी धर्म बन जाता है। इतना ही नहीं समाज और संबंधित धर्म द्वारा इन्हें इनके तथाकथित धर्म के अनुपालन के लिए पुरस्कृत भी किया जाता रहा है।

धर्म भय का व्यापार करते रहे हैं। कभी ऊपर वाले से डराते थे। आज विज्ञान ने ऊपर वाले का भेद पता कर लिया तो ये नीचे वालों को एक दूसरे का डर दिखा कर भयभीत कर अपना व्यापार चलाने लगे। भय इनका मार्केटिंग फंडा है। वास्तव में धर्म कभी ख़तरे में नहीं रहे। ख़तरे में जब भी पड़ीं, अपनी काई लगी जड़ता के कारण विचार धाराएँ पड़ीं। उन्हें ये बदले समय की बदलती हुई ज़रूरतों के हिसाब से माँज नहीं पाए । भीतर की सफ़ाई नहीं कर पाए। अपनी असमर्थता को छिपा धर्म पर ख़तरा दिखाकर रूढ़ियों की सदी काई को ही समेटने में लगे रहे।
धार्मिक उन्माद को एक नया नाम सांप्रदायिकता देकर भी धर्मों को बाइज्ज़त बरी कराया जाता रहा है। अपना देश आज़ादी के पहले और बाद में भी बँटवारे के दर्द से अधिक इसी के दर्द को समेटे घावों को सहलाता रहा है। साबरमती ट्रेन से लेकर समूचे गुजरात को चपेट में लेने वाली आग के गड़े मुर्दे न भी उखाड़ें तो भी हाल में आपने देश में मुज़फ्फर नगर और पुणे की घटनाएँ केवल और केवल धर्मांधता की देन हैं। केवल हमारा ही देश नहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यानमार, इजराइल, फिलिस्तीन,मिश्र, सीरिया, लेबनान और ईराक आदि न जाने कितने राष्ट्र आज भी धर्म की आग और उसकी आँच को कम नहीं कर पा रहे हैं। यह बात दीगर है कि इसमें दोषी कौन है और निर्दोष कौन पर धर्म की आँच में हर इन्सान और उसकी इंसानियत ही झुलस रही है। ईराक पर आए संकट को हल करने के राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयास निष्फल हो रहे हैं। युद्ध ही एक मात्र रास्ता शेष है लेकिन यह भी स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह भी शिया-सुन्नी के समीकरणों पर लड़ा जा रहा है। इन्हें कौन समझाए, "तू जला वो भी गलत था, मैं जला ये भी ग़लत। हौसला वो भी गलत था, हौंसला ये भी ग़लत।"

कोई भी धर्म किसी के भी प्रति किसी भी कोटि की हिंसा के लिए उकसाए यह निंदनीय ही है, अभिनंदनीय कदापि नहीं। समाज धर्मों की आस्लियत से वाकिफ़ हो इसके लिए ज़रूरी है उसको नए ढंग से शिक्षित किए जाने की। यह क्या है कि हम पहले ईसा को सूली पर चढ़ा के पछताते हैं रोते-पीटते हैं फिर आँसू सूखते ही उसी पर गेलीलियो को चढ़ा कर ताली पीट-पीट कर खुश होते हैं। फिर अचानक होश आता है तो रोना-पीटना शुरू कर देते हैं। अतः हमारे धर्मवान होने से ज्यादा ज़रूरी है ज्ञानवान होना। इससे आस्थाएँ हमें इस हद तक विवेक शून्य नहीं कर पाएँगी कि हम इन्हीं धर्मों के प्रति संवेदन शून्य हो जाएँ ।
आज की सच्चाई यह है कि यथार्थ के ज्ञान के अभाव में दुनिया धर्म और धर्मांधता के बीच भेद न कर पाने के कारण खुद भी असमंजस की सूली पर झूल रही है। पौराणिक कथाओं के आधार पर जीवन की सृष्टि मानने वालो! इंद्र के विलास को रोक कर कर जन-जीवन को सुख पहुँचाने वाले हरिश्चंद्र और तारा सत्यवादिता की सज़ा (अपने बेटे का कफ़न नुचवाने की) कब तक और भुगतेंगे? एक सेब की चोरी के एवज़ में देशनिकाला की सज़ा कब तक और चालू रहेगी? जबतक सोच को वैज्ञानिक धार नहीं दोगे सूलियों की सेज पर मनुष्यता सुलाई जाती रहेगी। इस सन्दर्भ में डॉ. उदय प्रताप सिंह की दो पंक्तियाँ हर धर्म के लोगों तक पहुँचाना बहुत ज़रूरी है और प्रासंगिक भी -

"पहले हँस-हँस के सूली पे चढ़ाती है ये गुमानी दुनिया।
फिर रो-रो के उसी के गीत गाती है बेमानी दुनिया॥"


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