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ISSN 2292-9754

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02.09.2017


तीखी वाणी बोलते

(कुण्डलिया छंद)

तीखी वाणी बोलते, और चुराते नैन।
करते घातें पीठ पर, मन का लूटें चैन।
मन का लूटें चैन, नये परपंच बनाते।
मन में राखे भेद, सगे बनकर दिखलाते।
जागृत है अब "गूँज", नीति बस ये ही सीखी।
रहती उनसे दूर, करें जो बातें तीखी।


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