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ISSN 2292-9754

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02.09.2017


काया क्षणभंगुर सुनो

(कुण्डलिया छंद)

काया क्षणभंगुर सुनो, कभी न करना नाज़।
गगन कभी छूती नहीं, है दंभी परवाज़।
है दंभी परवाज़, उड़ेंगे प्राण पखेरू।
आशा तृष्णा त्याग, अहम का तोड़ सुमेरू।
फिर क्यूँ अंतस "गूँज", कपट का जाल बिछाया।
उत्तम कर कुछ कर्म, मान क्षणभंगुर काया।


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