अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.09.2017


द्वारे बैठी राधिका

(कुण्डलिया छंद)

द्वारे बैठी राधिका, राह निहारे रोज़।
कान्हा छवि मन में बसी, नैन रहे हैं खोज।
नैन रहे हैं खोज, ध्यान मोहन में अटका।
देखत पलक उघार, होय यदि गलियन खटका।
हृदय रहा है "गूँज", कृष्ण धुन साँझ सकारे।
अब तो मथुरा छोड़, साँवरे आजा द्वारे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें