अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.09.2017


चाँद मुट्ठी में कर ले
 समोद सिंह चरौरा

पुस्तक - "चाँद मुट्ठी में कर ले" (साँझा काव्य-संग्रह)
संपादक - नवीन गौतम "निश्छल"
समीक्षक - समोद सिंह चरौरा
प्रकाशक - उत्कर्ष प्रकाशन, १४२,
शाक्य पुरी, कंकरखेड़ा, मेरठ
मूल्य - २५० रु.
पृष्ठ - २९५, सजिल्द

इस साझा काव्य संग्रह के सम्पादक श्री नवीन गौतम जी ने अपने हुनर से देश के कोने कोने से लेखनी के धनी प्रबुद्धजनों को तलाशकर व् तराशकर उनकी कलम से निकली काव्यरूपी ज्ञानधाराओं के जल से इस काव्य संग्रह को सिंचित किया है। मुझे उम्मीद है कि ये पुस्तक पाठक के दिल पर अपनी छाप छोड़ेगी। ..वैसे तो सभी मित्रों ने अपनी विशेषता से पुस्तक को विशेष बनाने के लिए अलग-अलग विधाओं में व अलग-अलग विषयों पर संदेशात्मक रचनाओं से सकारात्मक सन्देश देने की पूरी कोशिश की है, लेकिन कुछ मित्रों की विशेष संदेशात्मक रचनाओं को आप के साथ ज़रूर साझा करना चाहूँगा ..जैसे कि नवीन जी की कुण्डलिया छंद में लिखी ये रचना..

कहती कन्या कोख में, क्यों करती है शोक!
आने दे जग में मुझे, माँ मुझको मत रोक!!

...और इसी क्रम में आदरणीय अरविन्द पाराशर जी के सभी दोहे बहुत अच्छे हैं और भुजंगप्रयात छंद में लिखा ये गीत...

जहाँ वंचनाएँ सदा नाचती हों!
जहाँ वासनाएँ सदा बाँधती हों!!....

इसके बाद बेहद सुंदर भाव व संदेशों से भरपूर, रेनू शर्मा रेनुजा जी की चौपाइयाँ, कुण्डलिनी, दोहा, रोला, सवैया, पञ्चचामर, गीतिका, हरिगीतिका, सार, विधाता, ताटंक और मनमोहक घनाक्षरी छंद.और कमाल का कुकुभ

यत्न किया हो कितना भी पर!
मिट्टी में तो मिलना है..!!

..पुस्तक की एक सबसे अच्छी रचना जो जितेंद्र नील जी की क़लम से निकली। वैसे तो मैं नील जी के लेखन से भलीभाँति परिचित हूँ मगर आल्ह छंद में लिखी ये रचना वाकई... लाजवाब

माँग रही है भारत माता,
तुमसे अपना ये सम्मान!!

अभी बात करता हूँ छोटी बहन गुंजन की। गुंजन का लेखन वाकई काबिले तारीफ़ है इसमें कोई शक़ नहीं मैंने कभी भी गुंजन को नवांकुर नहीं माना। गुंजन जी की प्रत्येक रचना चाहे वो किसी भी छंद में लिखी हो एक मंझे हुए कवि की रचना प्रतीत होती ह॥ ..इस पुस्तक में लिखे सभी कुण्डलिया छंद बेहद शानदार हैं जैसे कि -

..क्षणभंगुर इस देह पर, करो नहीं तुम नाज!
दंभी ....
और
तीखी वाणी बोलकर, खूब तरेरे नैन!

वैसे इस काव्य संग्रह के बारे में जितना भी लिखूँ कम है लेकिन आदरणीय सुनंदा झा जी के काव्य को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैसे तो मैं सुनंदा जी के लेखन का प्रसंशक हूँ ...लेकिन फिर भी उनकी एक सुंदर रचना जो सार छंद में लिखी है, उससे आपको रूबरू कराता हूँ ....जो मुझे बहुत पसन्द है.....

सुन ओ! काले बादल जाकर, भैया से यह कहना!
राखी का धागा ले बहना, रस्ता देखे बहना!!

....मुझे लगा जैसे मुझसे कह रही हों।

अब बात आती है ऐसे कवि की जो मनमौजी हैं, मनमौजी थे और मनमौजी ही रहेंगे। मनोज जी की सभी दिल की गहराइयों से हास्य का पुट लेकर निकली हुई रचनाओं के साथ-साथ ओज से भरपूर सृजन वाकई कमाल का है। मनोज जी की सभी रचनाएँ मार्मिक व हास्य से भरपूर हैं - जैसे...

बीवी संग तकरार में, हँसते रहो हजूर!
सुबह, दोपहर, शाम को, खाओ साथ खजूर!!

....अभी और भी काफ़ी कुछ बाक़ी है..लिखने को मगर ज़्यादा न लिखते हुए मैं इतना ही कहूँगा..कि श्री सुशील तिवारी जी, श्री सत्येंद्र सिंह जी, श्री सतीश द्विवेदी जी, श्री सुरेश अग्रवाल जी, श्रीमहेश यादव जी, आशा रानी जी, प्रह्लाद सोनी जी, रंगनाथन शुक्ल जी, अल्का चन्द्रा जी, अंकुर शुक्ला व विनोद गंगावासी जी की सभी स्तरीय रचनाएँ इस पुस्तक की सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ हैं!

सभी मित्रों की रचनाएँ काबिले तारीफ़ हैं सभी को हार्दिक बधाई .......


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें