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ISSN 2292-9754

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03.16.2017


उत्सुक निगाहों से

उत्सुक निगाहों से...
कुम्हलाता है मन
धीरे-धीरे
सिसकते
दृश्य की तरह
सिर्फ़ अपनी ही तलाश में

उत्सुक निगाहों से....
पूछती है प्रश्न कितने
झलक तुम्‍हारी
मौन रहकर
दायरे की कुछ यादों में
गुम होते अँधेरे की तरह

उत्सुक निगाहों से....
रह-रहकर लेता है जन्म
सूखे पत्तों पर
बूँदों का अहसास
मुस्कान रहित सपनों की तरह
आँखों से दूर चला जाता है

उत्सुक निगाहों से....
वेदना के पत्थरों की सिरा पर
फूट रहे थे झरने आँखों से
थकी हुई इच्छाएँ थीं
बेबस
उम्र की ढलान पर….

उत्सुक निगाहों से....
साँझ के
सन्नाटों की दुविधा में
टूटे निर्मोही रिश्ते कंधों पर लादे
मंज़िलों को तरसती
टूटी दीवारें....

उत्सुक निगाहों से....
आशा निराशा के
पल पल ओझल पड़ावों में
दूर तक फैली आँसुओं की झील
एकाकी निर्जन
सपने उलझाये....


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