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ISSN 2292-9754

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01.01.2016


मन की छटपटाहट

अंतहीन सफ़र
अपने ही सायों के सिरों तक
बिफरे हुये आकाश के आइनों में
वेदनाओं के पत्थर की सिरा पर
फूट रहे थे झरने आँखों से

थकी हुई थीं इच्छाएँ
समय था बेबस
उम्र ही ढल गई
सांझ के सन्नाटों की दुविधा में

टूटे निर्मोही रिश्ते कंधों पर लादे
मंज़िलों को तरसें टूटी दिवारें
आस्थाएँ, निराशायें
पल-पल ओझल पड़ावों में

दूर तक फैले आँसुओं की झील
एकाकी निर्जन सपने उलझाये
बीता हुआ मौसम

साँझ
धीरे-धीरे गगन से उतरती हुई
अदृश्य को गढ़ती गीले गालों पर

निर्जीव मन में
सृजन करता गरल
टूटे हुये मन की छटपटाहट .......


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