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10.16.2014


न्याय

"द्रौपदी इस साम्राज्य की महारानी है और एक महारानी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी ही प्रजा की झोपड़ियों में आग लगाए। उन्होंने एक अक्षम्य अपराध किया है। उन्हें इसके लिए कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। मैं महाराज युधिष्ठर.... कानून को धर्मसम्मत मानते हुए उन्हें एक साल की सज़ा दिए जाने की घोषणा करता हूँ।"

महाराज का फ़ैसला सुनते ही राजदरबार में सन्नाटा सा छा गया था। चारों तरफ़ इस फ़ैसले पर कानाफूसी होने लगी, लेकिन उनके खिलाफ़ बोलने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था।

फ़ैसला सुन चुकने के बाद भीम से रहा नहीं गया। अपनी जगह से उठकर उन्होंने आपत्ति दर्ज की- "महाराज फ़ैसला देने के पूर्व आपको यह तो सोचना चाहिए था कि वे एक महारानी होने के साथ-साथ, आपकी-हमारी धर्मपत्नी भी है। यदि उन्होंने ऐसा किया है तो ज़रूर उसके पीछे कोई बड़ा कारण रहा होगा। उन्होंने जानबूझ कर तो ये सब नहीं किया होगा। अगर झोपडियाँ जला भी दी गयी हों तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है। हम उन्हें नयी झोपडियाँ बनाने के लिए बाँस-बल्लियाँ मुहैया करा सकते हैं। वे दूसरी झोपड़ी बना लेगें।"

"भीम... ये तुम कह रहे हो। एक जवाबदार आदमी इस तरह की बात कैसे कह सकता है? मैंने उन्हें सज़ा देने का आदेश ज़ारी कर दिया है। अब उन्हें एक साल तक कारावास में रहना होगा। इस फ़ैसले में अब कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है।"

"महाराज...यदि महारानी ने अपराध किया ही है तो उसकी सज़ा आप हम भाइयों को कैसे दे सकते हैं?"

"भीम ...आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?"

"महाराज.. एक वर्ष में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं। यदि इसमें पाँच का भाग दिया जाये तो तिहत्तर दिन आते हैं। जैसा कि माँ का आदेश है कि उस पर सभी भाइयों का समान अधिकार रहेगा। मतलब साफ़ है कि वे बारी-बारी से तिहत्तर दिन हम प्रत्येक के बीच गुज़ारेगीं। एक वर्ष की सज़ा का मतलब है कि हमारे तिहत्तर दिन भी उसमें शामिल होंगे और हमें यह मंजूर नहीं कि हम उस अवधि की सज़ा अकारण ही पाएँ। यह कैसा न्याय है आपका?"

भीम की बातों में दम था और वे जो कुछ भी कह रहे थे उसे झुठलाया नहीं जा सकता था। अब सोचने की बारी महाराज युधिष्ठर की थी। काफ़ी गंभीरता से सोचते हुए उन्होंने इस समस्या का हल खोज निकाला था। उन्होंने कहा- "चूँकि महारानी ने एक अक्षम्य अपराध किया है, और उन्हें इसकी सज़ा अवश्य ही मिलेगी। उन्हें एक साल का सश्रम कारावास दिया जाता है। सज़ा की अवधि, उनके अपने स्वयं की अवधि में रहकर काटनी होगी।"


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