अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
10.14.2014


दीपक माटी का

तुम हो सोने की वाटिका
तो मैं हूँ नन्हा दीपक माटी का

तुम प्रभात के साथ मिल
अलख जगाने आयी हो
जिसके रव में कोई
कवि रोता है या हँसता है

मेरा अस्ताचल का साथ
मानो भारी निद्रा लाया है
जिसका कण कण भी
आँखों में आंजे सोता है

दुनियां भी कितनी बौराई है
या फिर कोई पागलपन है
कोई कहता मिट्टी सोना हो गया
कोई कहता सोना मिट्टी हो गया

यदि ये अन्तर एकाकी हो जाये
तो दुनियां निर्विकार हो जाये


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें