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ISSN 2292-9754

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02.22.2015


छोटी सी चिड़िया

"रामदीन... ज़रा बड़े बाबू को मेरे कमरे में भिजवाना," बड़े साहब ने चपरासी को हुक्म बजा लाने को कहा।

"मे आई कम इन सर," बड़े बाबू ने कमरे में प्रवेश करने के पहले कहा।

"हाँ, तुम अन्दर आ सकते हो," साहब ने कहा। "देखो, मुझे बार घुमा-फ़िराकर कहने की आदत नहीं है। एक हफ़्ते के अन्दर मुझे पचास हज़ार रुपये चाहिएँ। इसका इन्तज़ाम कैसे हो सकता है, वह तुम जानो।"

"बिल्कुल हो जाएगा सर। आप चिन्ता न करें।" बड़ा बाबू अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसने अपने टेबल की दराज़ से कोरे कागज़ निकाले। टाईपराईटर में फँसाया और एक लेटर टाईप किया। और साहब के कमरे में जा पहुँचा।

"ये क्या है?" साहब ने कहा।"

कुछ नहीं हुज़ूर। यह एक छोटा सा कागज़ का पुर्जा है।"

"बड़े बाबू, तुम्हारा दिमाग ख़राब तो नहीं है। तुम जानते हो कि बीच सेशन में किसी का ट्रान्सफ़र नहीं किया जा सकता।"

"हुज़ूर जानता हूँ। प्यारेलाल इसी शहर में कई बरस से कुण्डली मारे बैठा है। फिर उसकी बीवी भी सरकारी नौकरी में है। फिर हमने उसका ट्रान्सफ़र थोड़े ही किया है। उसे तो हमने प्रमोशन दिया है। मैं जानता हूँ वह इतनी दूर नहीं जाएगा। आर्डर मिलते ही वह सिर पर पैर रखकर दौड़ा चला आएगा। और हमें मनचाही रकम दे जाएगा। बस आप इस कागज़ पर अपनी छोटी सी चिड़िया बिठा दीजिए और देखिये ये चिड़िया क्या कमाल दिखाती है।"

"समझ गया। तुम बहुत ही होशियार आदमी हो।"

"सर, ऐसी बात नहीं है। मैं तो आपका सेवक हूँ। और आपकी सेवा करना ही मेरा धर्म है।"


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