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ISSN 2292-9754

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07.08.2017


चील कौवे और गिद्ध

जिस जगह सारे शहर की गन्दगी और कूड़ा-करकट आकर जमा होता हो, जहाँ तक नज़र ले जाओ, वहीं तक कचरा-ही-कचरा दिखायी देता हो। पहाड़ सरीखे गन्दगी के बड़े-बड़े और ऊँचे-ऊँचे टीले दिखायी देते हों। कूड़े की दलदल में कीड़े बजबजाते हों। जगह-जगह मरे हुए मवेशियों की लोथें पड़ी हों, जिन्हें आवारा कुत्ते, चील-कौवे और गिद्ध नोच-नोच के खाते हों। जहाँ के वातावरण को सड़ा हुआ कचरा और मरे हुए मवेशियों की सड़ांध विषैला करती हो, जिसकी दुर्गंध के भभके नाक में घुस कर मन कसैला करते हों, उस जगह को नरक नहीं तो और क्या कहेंगे? ऐसी जगह पर किसी जवान लड़की का होना सबके लिए चौंकाने वाली बात हो सकती है। मैंने भी जब उसके बारे में सुना तो मैं स्तब्ध रह गया। दिल्ली हाई-वे की वो एक ऐसी जगह है, जहाँ हर समय वाहनों का आवागमन लगा रहता है।

वो जून की तपती दोपहरी थी। दिल्ली जाते वक़्त अचानक उसी जगह गाड़ी ख़राब हो जाने की वजह से कुछ देर वहाँ रुकना पड़ा। गला प्यास से सूख रहा था। ड्राईवर गाड़ी ठीक करने लगा। मैं गाड़ी से उतरकर सड़क किनारे लगे चाय के ठेले से पानी की बोतल खरीदने गया। ठेले के पास दो लोग पहले से खड़े उस लड़की की चर्चा कर रहे थे। उनकी बातें सुनकर मन में प्रश्न कुलबुलाया, जिस जगह दुर्गंध के मारे खड़ा होना मुश्किल हो रहा हो, वहाँ किसी लड़की का रहना....? क्यों रहती है वह वहाँ? क्या मजबूरी है उसकी?

चाय वाले लड़के को टटोला। लड़की के बारे में जानने की कोशिश की लेकिन वह टालमटोल करने लगा। उसके हाव-भाव से ये अनुमान तो लगा लिया कि वह उसके बारे में जानता सब है, लेकिन कुछ भी बताकर वह किसी मुसीबत में नहीं फँसना चाहता है?

मन नहीं माना तो ख़ुद ही चल पड़ा उस लड़की से मिलकर उसकी वहाँ रहने की मजबूरी जानने के लिए। बड़ी मुश्किल से उसके पास पहुँचा। जिस माहौल में मेरे लिए साँस लेना भी दूभर हो रहा था, वह वहाँ आराम से पसरी हुई थी यह देखकर मैं हैरान था। सोचा मुझे देखते ही वह एकदम उठ बैठेगी, मुझे अपनी मजबूरी और परेशानी बतायेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। वह चुपचाप लेटे-लेटे मुझे एकटक निहारती रही।

उसके शरीर की बनावट, क़द-कांठी, बड़ी-बड़ी काली कजरारी आँखें, होठों को छूती पतली नुकीली नाक और पतले-पतले गुलाब की पंखुड़ियों जैसे ख़ूबसूरत होठों को देखकर पता चल गया कि वह बला की ख़ूबसूरत और गोरी-चिकटी रही होगी। उसको सजने-सँवरने और फ़ैशन के अनुरूप कपड़े पहनने का भी शौक़ रहा होगा।

लेकिन अब घूरे की गन्दगी ने उसके शरीर पर अपना आवरण चढ़ाकर उसको भी अपनी तरह कूढ़े के ढेर में परिवर्तित कर लिया था। ज़ाहिर-सी बात है, जिसके शरीर पर महीने भर से पानी न पड़ा हो, उसकी यही हालत होगी। उसके लम्बे काले घने बाल धूल-धूसरित होकर ऐसे उलझ गये थे, जैसे नारियल की जटाएँ। हाथ-पैर और मुँह पर भी मैल की काली-काली पपड़ियाँ जम चुकी थीं। शरीर पर जो कपड़े बचे थे वो भी एकदम काले-चीकट, कीचड़ की तरह मैले-कुचैले, झिन्नी और जर्जर हो चुके थे, जिनका उसके शरीर पर होना या न होना कोई मायने नहीं रखता था। उसे देखकर ऐसा लगा, जैसे ख़ूबसूरत गुलाब के फूल पर कीचड़ के छींटे पड़ गये हों। उसकी कूड़े जैसी काया और ख़ामोशी को देखकर ही अनुमान लगा लिया कि वह दिल-दिमाग़ और शरीर से पूरी तरह टूट चुकी थी। उसकी इच्छाशक्ति भी मर चुकी थी वरना कोई भी जवान और ख़ूबसूरत लड़की इस तरह नारकीय जीवन क्यों जियेगी?

मन क्षुब्ध हो सोचने लगा कि उसकी यह हालत कैसे हुई? उसे उस नरक में ढकेलने वाला कौन है? मैंने उससे पूछा भी, पर उसने मेरे किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया।

हार, झक मार कर मैं वापस उसी चाय वाले लड़के के पास आया। इस समय वह पूरी तरह अकेला था। मैंने उससे उसके बारे में फिर पूछा। पहले तो वह अनजान बनकर आनाकानी करने लगा, लेकिन जब मैंने उसको यक़ीन दिलाया कि मेरी वजह से उसको कोई परेशानी नहीं होगी, तब कहीं जाकर वह कुछ बताने के लिए राज़ी हुआ।

उसने जो बताया, उसे सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। उसने बताया वह पिछले एक महीने से यहाँ है। पहले सड़क पर यूँ ही गुमसुम-सी इधर-से-उधर घूमती फिरती थी। भूख लगती तो ठेले के पास चुपचाप आकर खड़ी हो जाती थी, जो दे दिया खा लिया और नहीं दिया तो माँगा नहीं। एक ऑटो वाला उसे कहीं से बहला-फुसलाकर यहाँ ले आया था फिर वह यहाँ से जा नहीं पायी। जाती भी कहाँ? शायद वह इस शहर से अनजान थी, यहाँ की बोली-भाषा से भी अनजान थी इसलिए वह अपने बारे में किसी को कुछ बता नहीं पायी। लोगों को तो मौक़ा चाहिए साब, किसी की भी मजबूरी से खेलने का, सो उन्हें मिल गया मौक़ा। बेचारी, बचती भी तो किससे और कैसे बचती?

जब तक शरीर में ताक़त रही, तब तक वह लोगों की ज़ोर-ज़बरदस्ती और मनमानी को झेलती रही। जब उसके शरीर ने साथ छोड़ दिया तो पसर गयी, यहीं ज़मीन पर। बेचारी का भूखा-प्यासा, जर्जर शरीर कब तक खड़ा रहता? दिन-दिन भर आँखें मीचे अपना पेट पकड़ कर यहीं सड़क किनारे ज़मीन पर पड़ी रहती। उसके अन्दर इतनी भी हिम्मत बाक़ी नहीं बची थी कि उठकर कुछ देर बैठ सके। मगर हवस के भूखे भेड़ियों को कहाँ चैन था। वो आते और चाय में बंद डुबोकर उसके मुँह में ठूँसते। उसका मन नहीं भी होता खाने को, बार-बार उगलती, फिर भी ज़बरदस्ती उसको खिलाते और ज़बरदस्ती ले जाते उससे अपने शरीर की तपन को ठण्डा करने के लिए।

बेचारी तन-मन दोनों से पूरी तरह टूटकर बिखर गयी। उसके अन्दर चलने-फिरने की जरा भी ताक़त बाक़ी नहीं बची तो बेचारी बड़ी मुश्किल से यहाँ से उठकर वहाँ कूड़े के ढेर पर जाकर पड़ गयी। उन भूखे भेड़ियों और दरिन्दों से बचने के लिए, जो उसे चैन नहीं लगने दे रहे थे। शायद यही सोचकर कि कूड़े पर उसके पास कोई आने की हिम्मत नहीं करेगा और वह कुछ चैन पा जायेगी, मगर साब चील-कौवे और गिद्ध सरीखे लोगों ने उसे वहाँ भी चैन नहीं लगने दिया। वहाँ भी वो पहुँचने लगे, उसके शरीर को नोंच-नोंच कर खाने के लिए। वो सब देखकर सा’ब हमें बहुत ग़ुस्सा आता, लेकिन हम कर भी क्या सकते थे, हमारे ग़ुस्से को कौन देख रहा था, कोई नहीं।

उसकी दुर्दशा की कहानी सुनकर कलेजा लरज गया। मैं सोचने लगा कि दस क़दम दूर ही से जिसके पास से दुर्गंध आ रही हो, जिसको छूना तो दूर की बात, उसके पास खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा हो, उसके शरीर से खिलबाड़ करना, किसी इन्सान का नहीं, हैवान का ही काम हो सकता है। कितनी गन्दी और लिजलिजी मानसिकता के लोग होंगे वो? सचमुच वो किसी चील और गिद्ध से कम नहीं, क्योंकि चील और गिद्ध को ही खाने के लिए मांस चाहिए, वो भी मरा, सड़ा और गला हुआ मांस। उन्हें तो उस लाश को नोंच-नोंच कर खाने में ही मज़ा आता है। बस उनके जिस्म की भूख मिटनी चाहिए।

वह भी किसी लाश से कम नहीं थी। ज़िन्दा लाश। एकदम मांस का लोथड़ा, जिसे चील-कौवे और गिद्ध सरीखे पुरुष नोंच-नोंच कर खाते और अपनी हवस की भूख मिटाते। जैसे चाहते जब चाहते, जहाँ से चाहते, उसे खाकर चले जाते। पर उसके अन्दर कोई हरकत नहीं होती। वह एकदम ऐेसे पड़ी रहती, जैसे कोई फालिश का मरीज। न कोई सिसकी, न कोई आह, न कोई रोना-धोना....न किसी का विरोध।

विरोध करती भी तो किसका? जानवरों का कोई दीन-ईमान होता है क्या? न ही उनके अन्दर दया-धर्म नाम की चीज़ होती है, न इंसानियत, न सहानुभूति और न ही संवेदनशीलता। वो न किसी के दर्द को महसूस करते हैं और न किसी की पीड़ा को। वह विरोध करे भी तो किसका? उनका, जिन्होंने उसके शरीर को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी निचोड़ लिया हो, जो औरत को सिर्फ-और-सिर्फ भोगने की वस्तु से ज़्यादा कुछ नहीं समझते, जो एक निरीह, बेवश, कमज़ोर और लाचार औरत के साथ पशुवत व्यवहार करते हैं? कीड़े-मकोड़ों से भी बदत्तर होती उसकी दशा को देखकर स्वतः ही मन में कई सवाल कौंधने लगे, “क्या यही है हमारी सामाजिक व्यवस्था?”

उसके स्थान पर अगर कोई संभ्रांत और रसूख़दार की बेटी, होती, तो क्या वह यहाँ ऐसे पड़ी होती? उसके साथ एक बार भी बलात्कार हो गया होता, तो चारों तरफ हाय-तौबा मच गयी होती। बलात्कारी के विरोध में पूरा देश एकजुट होकर आन्दोलन और धरना-प्रदर्शन पर उतर आया होता। कैण्डिल मार्च निकल गये होते। सड़क से संसद तक खलबली मच गयी होती। सामाजिक संस्थाएँ और संगठन अपना विरोध प्रगट कर रहे होते और विरोध की उस आग पर राजनीतिक रोटियाँ सिंक रही होंती। अन्ततः बलात्कार की शिकार पीड़िता को न्याय मिल गया होता और बलात्कारियों को फाँसी की नहीं तो उम्र क़ैद की सज़ा ज़रूर सुना दी गयी होती। बलात्कार की शिकार पीड़िता की सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का पूरा ख़याल रखने की बात अधिकारिक तौर पर कह दी गई होती और उसको मुआवज़ा भी दिलवाया गया होता।

लेकिन उसके साथ तो रोज़ बलात्कार होता है। सुबह, दोपहर और शाम को बलात्कार होता है। ख़ूब होता है। एक नहीं कई बलात्कारियों के द्वारा होता है। इसे बलात्कार नहीं तो और क्या कहेंगे? बिना किसी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उसका शारीरिक शोषण करना बलात्कार नहीं तो क्या हुआ? फिर इसके बलात्कारियों के विरोध में कोई स्वर मुखरित क्यों नहीं हुआ? क्यों कोई सामाजिक और राजनैतिक संस्था उसको न्याय दिलवाने के लिए सामने नहीं आयी? क्यों किसी ने कैण्डिल मार्च नहीं निकाले? क्यों? क्या वह इतने बड़े देश में किसी की बहन-बेटी नहीं है? या फिर वह हमारे समाज का हिस्सा नहीं है?

ऐसा भी नहीं है। वह हमारे समाज का हिस्सा भी है और किसी की बहन-बेटी भी, पर उसके अन्दर बलात्कारियों का विरोध करने की क़ुव्वत और ताक़त नहीं है। वह रसूख़दार भी नहीं है। वह वेबस और लाचार है। उसकी न सामाजिक पहचान है और न प्रतिष्ठा। इसलिए उसकी पैरवी करके किसी को कुछ मिलने वाला नहीं है। न मान-सम्मान, न पुरस्कार, न कोई पद-प्रतिष्ठा, न कुर्सी और न कोई आर्थिक लाभ। न अख़बारों में उनके फोटो छपने वाले हैं, न कोई उनकी जय-जयकार करने वाला, क्योंकि इस देश में सब कुछ स्वार्थवश ही तो होता है, निःस्वार्थ तो कुछ भी नहीं होता है। हाँ बलात्कारियों का हौसला ज़रूर बढ़ जाता है और वो बेख़ौफ़ होकर किसी भी मजबूर बहन-बेटी, माँ और पत्नी के साथ बलात्कार करते हैं। वो भी एक चाय और बन्द का मुआवज़ा देकर। आज एक मजबूर और बेसहारा औरत का शारीरिक शोषण करने की क़ीमत एक बंद और एक चाय ही तो रह गयी है? यही तरक़्क़ी की है हमारे देश ने।

ड्राईवर से गाड़ी ठीक हो जाने का संकेत मिला। भारी मन से मैं गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी आगे बढ़ गयी। तन से तो मैं गाड़ी में जा रहा था और मन से वहीं उस कूड़े के ढेर पर खड़ा उसी के बारे में सोच रहा था। कई सवाल मन-मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा रहे थे और महिला सुरक्षा-संरक्षा, शिक्षा तथा बेटी बचाओ के सरकारी नारों की गूँज उन सवालों में विलीन हो रही थी।


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