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| 06.24.2007 |
| चंगेरीलाल का हस्ताक्षर ज्ञान डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल |
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चंगेरीलाल साक्षर बन गया था। गाँव के और लोग भी सरकार द्वारा चलाए एक अभियान की चपेट में आकर अक्षर को अक्षर ही समझने-देखने लगे थे, भैंस बराबर नहीं। ऐसा ही बताया गया था सरकारी रिपोर्टों में। चंगेरीलाल से हमारी भेंट हुई तो उसने हमें बताया कि वह हस्ताक्षर करना सीख गया है और गाँव में कुछ वर्ष पहले जो बैंक खुला था, उसने उसमें अपना खाता भी खोल लिया है। ‘अब तक तो मारे सरम के खाता न खोला था जी। कागजों पर अँगूठा टेकते सरम लगे थी।’ चंगेरीलाल ने हमें बताया था। हम जाने थे, चंगेरीलाल गरीब घराने का बच्चा था। जब वह पैदा हुआ था, तब भारी संकट से गुजर रहा था, उसका परिवार। बालक के जन्म लेने की खुशी में मौसी बच्चे के दो जोड़ी कपड़े एक नई बुनी हुई रंगबिरंगी चंगेरी में धरकर दे गई थी, जिससे खुश होकर बापू ने उसका नाम चंगेरीलाल रख दिया था। इस बात को लंबा समय बीत गया। आप जानते हैं, समय तो पंख लगाकर उड़ जाता है, यादें छोड़ जाता है आदमी के मन-मस्तिष्क में। चंगेरीलाल के नामकरण की बात हमें अब तक ऐसे याद है, जैसे कल ही की घटना हो, जबकि चंगेरीलाल अब अधेड़ उम्र को पार कर रहा है, बचपन में ऐसी स्थिति थी ही नहीं कि वह लिख-पढ़ सकता। तब अनपढ़ लोगों ने पढ़े-लिखे के आतंक से मुक्ति पाने के लिए तरह-तरह की कहावतें घढ़ लीं। जैसे, पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, यह देखो कुदरत के खेल। अथवा पढ़ेंगे-लिखेंगे होंगे खराब, खेलेंगे कूदेंगे होंगे नवाब! चंगेरीलाल तब नहीं जानता था कि ऐसे चुटकुले हीन-भावना से मुक्ति पाने के लिए गढ़ लेते हैं लोग। जब पढ़े-लिखे उन पर धौंस जमाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगें तो अनपढ़ ऐसी कहावतें रचकर आत्मसंतुष्टि का मार्ग न खोजें तो क्या करें! पर अनपढ़ तो अनपढ़ ही है। चंगेरीलाल बचपन में यह बात नहीं जानता था, बुढ़ापे तक आते-आते यह समझ गया कि अनपढ़ होने से बड़ा अभिशाप और कोई नहीं। गाँव गए और चंगेरीलाल से हमारी भेंट हुई तो हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि चंगेरीलाल साक्षर हो गया है, यानी उसने अँगूठा टेक बिरादरी से निकलकर अपनी गिनती दस्तखत छाप बिरादरी में कर वाली है। बोला, ‘म्हारे इलाक्के मां सरकार ने साढ़े तीन हजार रूपइया खरच करा है इव जनता को साखसर बनाने मां। ओर सौके सौ बंदे साखसर बन गए हैं जी।’ हमने कहा, ‘हमें तो विश्वास नहीं हो रहा है चंगेरीलाल। सरकार की रिपोर्ट भला सच निकलती है कभी। पिछले दिनों रिपोर्ट छपी कि प्रदेश के हर गाँव में एक प्राथमिक स्कूल की स्थापना कर दी है, सरकार ने। अब बताओ, कहाँ बने हैं ये स्कूल। कहीं दिखाई देते हैं? तुम्हें? कहीं स्कूल है तो टीचर नहीं हैं। टीचर हैं तो स्कूल नहीं हैं। कुछ समय पूर्व सरकार ने ढिंढोरा पीटा कि हर गाँव को लिंक रोड बनाकर मुख्यालय से जोड़ दिया गया है। अब बताओ कहीं कोई लिंक रोड दिखाई देता है तुम्हें। कच्ची मिट्टी ज्यों की त्यों पड़ी है, रोड गायब हो गयी। ‘वह तो तुम ठीक कहते हो जी।’ चंगेरीलाल ने हमसे कुछ सहमत होते हुए कहा, ‘पर सरकार झूठ काहे को बोलेगी। वह किसी से डरती थोड़ा है भैयाजी। हमें लगा चंगेरीलाल ने बात काफ़ी पते की कही थी। जब हम बच्चे थे तो बाप के डर से झूठ बोलते थे, अध्यापक के डर से झूठ बोलते थे, माँजी के डर से झूठ बोलते थे। शौकिया झूठ बोलने वालों को छोड़कर दुनिया में जितने भी झूठे हैं, वह किसी न किसी डर के कारण झूठ बोलने पर विवश होते हैं। चंगेरीलाल कह रहा था, ‘सरकार किसी से डरती थोड़ा है भैया
जी, जो वह झूठ बोलेगी। डर रही होती तो सिपाई जनता की पीठ पर लाठी न
फ़टकारता, लेखपाल किसान की जेब न काटता, ग्राम प्रधान विकास का पैसा हजम न
कर जाता। निडर है, तभी तो ये सब करे है सरकार।’ ‘झूठ ना बोलेंगे जी’ चंगेरीलाल ने धीरज से उत्तर दिया, ‘अध्यापक टीम आवे तो थी गाँव में यदाकदा। पर ..... चंगेरीलाल वाक्य पूरा करने से पहले ही रुक गया। हमने उसे आगे कुरेदना भी नहीं चाहा, क्येांकि ‘पर’ के आगे जो वह कहने वाला था, हम पहले ही उसे परख गए थे। हमने पहलू बदलते हुए पूछा चंगेरीलाल से- ‘क्यों चंगेरीलाल, तुम कितने साक्षर हुए हो अब तक।’ ‘कुछ जादा तो नहीं जी, पर दस्तखत बनाना तो सीख ही लिया है जैसे-तैसे करके।’ ‘कुछ पुस्तक-वुस्तक पढ़ लेते हो चंगेरीलाल प्राइमरी स्तर की’ हमने चंगेरीलाल से पूछा। ‘ना जी ना- राम का नाम लो-’ चंगेरीलाल झट से बोला, ‘दस्तखत बनाने के सिवा कुछ और ना आवे है जी हमें।’ ‘तो साक्षरता वाले तुम्हें केवल दस्तखत बनाना सिखाकर छुट्टी कर गए। अक्षरज्ञान नहीं कराया।’ हमने पूछा। ‘अक्षर ज्ञान! तौबा करो जी चंगेरीलाल बोला, ‘वह तो जी एक बार दस्तखत वाले अक्षर बना गए थे, कागज पर हमने सौ दो सौ दफा उनकी नकल मारी तो सीख गए दस्तखत बनाना।’ चंगेरीलाल ने सच्ची-सच्ची बात बताई तो हमें उसकी सरलता पर हँसी आ गई। बोले, ‘तुमने तो सौ दो सौ दफा नकल मार ली चंगेरीलाल लेकिन क्या सबने ऐसा ही किया होगा। और मान लो किया भी हो तो अकेले दस्तखत बनाने से किसी आदमी को शिक्षित कहा जा सकता है क्या?’ चंगेरीलाल ने हमारी बार सुनी तो थोड़ा चकराया। हमने उसकी चकराहट में थोड़ी और वृद्धि की, ‘आज ही अखबार में छपा है चंगेरीलाल। सरकार ने इस क्षेत्र में साढ़े तीन करोड़ रुपया साक्षर अभियान की मद में खर्च किया, पर साक्षर एक भी नहीं बना।’ ‘एक भी नहीं बना।’ चंगेरीलाल ने अचरज से पूछा, ‘तब यह साढ़े तीन करोड़ कहाँ गया जी?’ हमने कहा, ‘जाने की मत पूछो चंगेरीलाल, रुपया कहाँ से आता है, कहाँ जाता है यह जानने के चक्कर में पड़ गए तो कहीं के न रहोगे, भाई। आता है तुम्हारी-हमारी जेब से और जाता है ...बस मत पूछो, कहाँ जाता है?’ चंगेरीलाल ने रुपये के आवागमन के चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं समझी, पर हमें लगा कि वह हस्ताक्षर बनाना सीखकर पहले से ज्यादा खुश है, उसे लगता है, मानो वह सचमुच ही साक्षर हो गया है?’ काफ़ी समय के बाद संयोग से एक दिन हमने ेखा कि चंगेरीलाल गाँव की बैंक शाखा में खड़ा है। हम भी किस्मत के मारे किसी काम से उधर जा निकले थे। हमने देखा काउंटर पर खड़ा चंगेरीलाल किसी बैंककर्मी की डाँट खा रहा है तू-तू मैं-मैं कर रहा है। हम काफ़ी देर तक दोनों के बीच हो रही गर्मा-गर्मी को देखते रहे। बैंककर्मी कह रहा था, ‘तुम चंगेरीलाल नहीं हो। तुम चंगेरीलाल नहीं हो’ जबकि चंगेरीलाल जिद्द कर रहा था कि तुम्हारा भेजा फ़िर गया है, जो तुम असली चंगेरीलाल को नकली चंगेरीलाल बता रहे हो और खाते का पैसा निकालकर देने को तैयार नहीं हो। काउंटर पर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी और जैसाकि ऐसे अवसरों पर होता है, सबके सब लोग बैंककर्मी के पक्षधर बन गए थे। चंगेरीलाल की कहने वाला एक भी नहीं था। जाहिर था जो लोग बैंक में अपना-अपना काम लेकर आए थे, वे बैंककर्मियों का समर्थन कर उन्हें खुश करते या चंगेरीलाल का साथ देते। हमने देखा बेचारा चंगेरीलाल भीड़ के बीच अकेला पड़ गया है। बड़ी मुश्किल से काउंटर पर कंधे से कंधा भिड़ाए लोगों को चीरते हुए हम थोड़ा भीतर पहुँचे पूछताछ की तो पता चला कि फ़ार्म पर चंगेरीलाल के दस्तखत उन दस्तखतों से नहीं मिल रहे थे, जो उसने खाता खोलने वाले फ़ार्म पर किए थे। चंगेरीलाल भारी संकट में पड़ गया था। दोनों पक्षों के बीच रह रहे संघर्ष ने थोड़ा और जोर पकड़ा। आवाज आई- ‘तुम चंगेरीलाल नहीं हो।’ हम बड़ी मुश्किल से अंदर पहुँचे। पूछताछ की तो काउंटर पर बैठे लिपिक ने बताया, ‘इन साहब से वह कोई दो दर्जन बार यह दस्तखत बनवाकर देख चुका है, पर कोई भी दस्तखत उस दस्तखत से नहीं मिलता, जो इन्होंने खाता खोलने वाले फ़ार्म पर किए थे।’ यह कहते हुए लिपिक ने एक कागज हमारी तरफ़ बढ़ा दिया। हमने देखा कि कागज पर दर्जनों बार दस्तखत किए थे चंगेरीलाल ने, पर कोई भी दस्तखत पहले वाले दस्तखत से मेल नहीं खा रहा था। लिपिक अड़ा हुआ था कि न यह चंगेरीलाल है और न यह इसके हस्ताक्षर हैं। चंगेरीलाल ज़िद्द कर रहा है कि तुम मुझे चंगरीलाल मानो और मेरे दस्तखत को भी चंगेरीलाल के दस्तखत मानो। दोनों पक्षों में जब समझौते की कोई राह न निकली तो हमने सलाह दी कि बैंक में मौजूद फ़ोटो से इनके चेहरे का मिलान कर लो।’ लिपिक बोला, ‘वह तो पहले ही कर दिया है जी। यह ठीक है कि फ़ोटो इनके चौखटे से मिलता है पर क्या दो आदमी एक चेहरे के नहीं हो सकते?’ हमने कहा, ‘हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं।। पर हमारे ज्ञान के अनुसार असली चंगेरीलाल यही हैं। नए-नए साक्षर हुए हैं, इसलिए हर बार दस्तखत भूल जाते हैं या बदल देते हैं।’ ‘ऐसे नहीं चलेगा जी।’ लिपिक बोला। हम जानते हैं कि हथेली की खुजली का सही ढंग से इलाज हो जाए तो नकली चंगेरीलाल भी असली चंगेरीलाल सिद्ध हो जाता है। लिपिक ने हमारी हथेली खुजाकर अपनी हथेली की खुजली हम पर जाहिर की थी। सो हमने गवाही पर दस्तखत किए, तब कहीं जाकर नया-नया साक्षर बना चंगेरीलाल अपने पैसे का भुगतान लेकर घर आ सका। हमने लौटकर चंगेरीलाल से कहा, ‘सारी गड़बड़ यह है चंगेरीलाल कि तुम्हें अक्षरज्ञान की जगह हस्ताक्षर ज्ञान दिया गया। वह भी नकली असली नहीं। इसीलिए तुम असली चंगेरीलाल से नकली चंगेरीलाल बन गए और तुम्हें बिला वजह बैंककर्मी की हथेली की खाज बुझाने पर विवश होना पड़ा। समझे!’ चंगेरीलाल ने कोई उत्तर नहीं दिया पर हम समझते हैं कि वह
समझ गया होगा। |
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