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ISSN 2292-9754

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05.20.2017


रीढ़

एक ही बीज में रहते थे
पल्लव और जड़
कुछ ही दिन का पोषण था
उनके पास मगर

कुछ मजबूरी, कुछ जिज्ञासा
दोनों के थी अंतर
सहमति से तोड़ा
उन्होंने सुरक्षा कवच

जड़ जड़ गई धरती में
सँभाला धरातल
रंग बिरंगी दुनिया देखने
बाहर आया पल्लव

एक मूक अनुबन्ध से
जुड़ा उनका जीवन

तना और पत्ते
जब तक देते रहेंगे हवा, धूप, पानी
और जड़ देती रहेगी खाद
वृक्ष खड़ा रहेगा
सीधी रीढ़ के साथ


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