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ISSN 2292-9754

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03.16.2017


इस लोक में

इस लोक में देवकन्याएँ नहीं आती
आती हैं तो
कभी हँसती, कभी रूठती,
नकचड़ी सी फरमाईशें
जो इसे
देवलोक हैं बनाती

इस लोक में देवता नहीं दिखते
दिखते हैं तो
गठीले, रौबीले फ़रमान
कभी पूरे, कभी अधूरे
अरमान
जो यहाँ
कितने देवालय हैं बनाते

इस लोक में कल्पवृक्ष नहीं उगते
उगते हैं तो
रसदार और फलदार
अनुभव
जो जीवन को
सुधा रस से हैं भरते

चाँद सितारे बसते अंबर
सूरज का भी घर नील गगन
छोटे-छोटे जूगनू भी लेकिन
धरती को कर देते जगमग


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