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ISSN 2292-9754

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04.13.2017


हँसते ही

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही

फूल खिल जाते हैं
दिल मिल जाते हैं
ग़म के स्तंभ हिल जाते हैं

रंग छा जाते हैं
ढंग भा जाते हैं
दंभ के व्यंग्य सकुचाते हैं

राग बज जाते हैं
भाग जग जाते हैं
हर्ष के पल मिल जाते हैं

पर्दे उठ जाते हैं
अंतर घट जाते हैं
छल के बल घट जाते हैं

बंधन खुल जाते हैं
रस्ते मिल जाते हैं
दर्द के दंश घुल जाते हैं

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही
तत्व अमरत्व के पास आते हैं
और
अम्ल आसुरी मुड़ जाते हैं


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