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08.21.2007
 
ताज़ा हवा
डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़


दूर रह कर भी उसको भुला न सका,
उसकी यादें मेरी ज़िन्दगी बन गई,
रेखाओं से रेखाएँ मिलाता रहा,
हाथ रुका तो उसकी छबी बन गई

मैंने गोकुल में ढूँढा, गरुकुल में ढूँढा,
ना राधा मिली, ना मीरा मिली,
आँख झपकी तो उसने पुकारा मुझे,
आँख खोला तो, ताज़ा हवा बन गई

लोग आते रहे, लोग जाते रहे
हम भी शामिल थे उसकी रुसवाई में
जो होना था, वह तो हो ही गया
दिल की धड़कन मेरी आरज़ू बन गई

मैं भटकता रहा बादलों की तरह
कभी गरजता, तो कभी बरसता रहा
सिसकियों से उतारा, लहद में उसे
मुँह से पर्दा हटा, रौशनी हो गई

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