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| 08.21.2007 |
| परछाइयाँ डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
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बेकराँ सोज़ से लबरेज़ है परछाइयाँ, हर तरफ, हर सिम्त मिल जाती हैं परछाइयाँ जब कभी हम सुनाते हैं हाल -ए- दिल वो चली जाती हैं, मुस्कराती है परछाइयाँ मौत आएगी और चले जाऐंगे हम चंद यादें, मुस्कराहटें , रह जाऐंगी परछाइयाँ कह रहा है मौत से, काली रातों का सुक़ूत सुब्ह की पहली किरण, ले आएगी परछाइयाँ नफरतों को तर्क कर, प्यार करना सीख लो प्यार करना सीख लो, मुस्कुराना सीख लो ऊँच नीच के भेद - भाव, अगर बाक़ी रहे फिर तुम्हारे क़द से ऊँची हो जाएगी परछाइयाँ कौन कहता है, मौत आएगी, मर जाऊँगा, मैं मुस्कुराते, गीत गाते, आएगी, मेरी परछाइयाँ एक मुद्दत हो गई, गुज़रे हुए उनको ’शरीफ’ रोज़ ख़्वाबों में नज़र आती है क्यों परछाइयाँ |
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