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08.21.2007
 
मज़ार
डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़

बस्ती से दूर,
सुनसान जंगल में,
थी एक ’मज़ार’।
सोचा चलकर ’ज़ियारत’ करें,
विनती करें बिगड़ी बनाएँ।
एक लम्बा रास्ता तै कर,
पहुँचा जब ’मज़ार’ पर!
पर यह क्या!!
एक स्त्री-पुरुष, वस्त्रहीन,
आमोद-प्रमोद में लीन!
व्यस्थ थे!!

यह देख मन विचलित हो गया।
आशाओं पर पानी फिर गया।
मैंने सोचा --
जब इन दुष्टों को यह रोक नहीं सकते,
तो मेरा क्या उद्धार करेंगे?

लौटा मैं वापस, निर्धूत मन लिए,
बग़ैर दुआ माँगे!
रास्ते में एक पेड़ के नीचे,
किया विश्राम कुछ देर,
अक्समात लग गई आँख।
स्वप्न में देखा --
संबोधित हैं एक बुज़ुर्ग -
"मुझसे मिले बग़ैर चले आये?"

मैंने साहस कर दिया जवाब -
"हज़ूर, अपने पास हो रहे
कुकर्म को रोक नहीं सकते
तो मेरे लिए क्या करेंगे?"

’बुज़ुर्ग’ मुस्कुराए और कहा --
"इस नीली छतरी के नीचे
क्या नहीं हो रहा?
जब वह नीली छतरी वाला
सब कुछ देख कर अनजान है,
फिर मैं ते उसका
एक अदना ’ग़ुलाम’ हूँ!
तू अपना काम कर
दुष्टों को अपना काम करने दे।"

मेरी आँखें खुल गईं
और
वापस दौड़ पड़ा ’मज़ार’ की
जानिब!!


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