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| 08.21.2007 |
| मजबूरी डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
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रोक सको तो चारुचन्द्र की रोक सको तो गंगा की रोक सको तो वर्षा की रोक सको तो फूलों की रोक सको तो निरवलम्ब के |
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