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08.21.2007
 
मजबूरी
डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़

रोक सको तो चारुचन्द्र की
चंचल किरणों को रोको,
चकोर का इसमें दोष ही क्या
यह है उसकी मजबूरी

रोक सको तो गंगा की
पावन लहरों के रोको,
पापों की गठरी को धोना,
यह है उसकी मजबूरी

रोक सको तो वर्षा की
नन्हीं बूँदों को रोको,
वसुन्धरा तो महकेगी
यह है उसकी मजबूरी

रोक सको तो फूलों की
मादकता को रोको
मधुकर का मन रिझाना
यह है उसकी मजबूरी

रोक सको तो निरवलम्ब के
बहते आँसू को रोको,
नयनों को तो बहना है,
यह है उसकी मजबूरी


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