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ISSN 2292-9754

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05.22.2017


जो जहाँ भी जहां से उठता है

जो जहाँ भी जहां से उठता है
तो ज़नाजा वहाँ से उठता है

बात पूरी नहीं करी तो फिर
अक़्द तेरी ज़बां से उठता है
अक़्द=अंदाज़ा

आब ही तो है जान मोती की
भाव उसका वहाँ से उठता है

कश्तियाँ डूब डूब जाती हैं
यह बवंडर कहाँ से उठता है

बस्तियाँ ख़ाक ही न हो जायें
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है

आग से खेलता भला क्या है
ये पतंगा कहाँ से उठता है
इल्म तो "हिन्दुस्तान" से आया
शोर सारे जहां से उठता है


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