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05.31.2008
 
सुबह होती है तो दफ़्तर में बदल जाता है
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

सुबह होती है तो दफ़्तर में बदल जाता है
ये मकां रात को फिर घर में बदल जाता है

अब तो हर शहर है इक शहरे-तिलिस्मी कि जहाँ
जो भी जाता है वो पत्थर में बदल जाता है

एक लमहा भी ठहरता नहीं लमहा कोई
पेशमंज़र पसे - मंज़र में बदल जाता है

नक्श उभरता है उमीदों का फ़लक पर कोई
और फिर धुन्द की चादर में बदल जाता है

बन्द हो जाता है कूज़े में कभी दरिया भी
और कभी कतरा समुन्दर में बदल जाता है

प्यार से पड़ती है जब उस पे इशारों की नज़र
संग भी ख्वाहिशे - "आज़र" में बदल जाता है

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