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05.31.2008
 
शबनमी धूप के आँगन में मिलेगी मुझको
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

शबनमी धूप के आँगन में मिलेगी मुझको
उसका वादा है कि सावन में मिलेगी मुझको 

आज  फिर क़िस्मते-गुलफ़ाम चुरा लाया हूँ
आज फिर सब्ज़ परी बन में मिलेगी मुझको 

उस से पूछूँगा कि किस हाल में है चाँद मेरा
चाँदनी जब मेरे आँगन में मिलेगी मुझको 

क्या करेगी मुझे मरऊब सितारों की बहार
ये कशिश भी तेरे कंगन में मिलेगी मुझको 

वो पुकारे न पुकारे मुझे "आज़र"  लेकिन
उसकी आवाज़ मेरे फ़न में मिलेगी मुझको

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