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05.31.2008
 
पड़ा था लिखना मुझे खुद ही मर्सिया मेरा
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

पड़ा था लिखना मुझे खुद ही मर्सिया मेरा
कि मेरे बाद भला और कौन था मेरा

अजीब तौर की मुझ को सजा सुनाई गई
बदन के नेज़े पे सर रख दिया गया मेरा

भटक रहा हूँ मैं लावरिसी के आलम में
बना के भूल गया है मुझे खुदा मेरा

यही कि साँस भी लेने न देगी अब मुझ को
ज़ेयादा और बिगाड़ेगी क्या हवा मेरा

मैं अपनी रूह लिये दर बदर भटकता रहा
बदन से दूर मुकम्मल वजूद था मेरा

बस एक बार मिला था कहीं मुझे "आज़र"
बना गया वो मुझी को मुजस्स्मा मेरा

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