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| 05.31.2008 |
| नन्ही गज़ल डॉ. फ़रियाद "आज़र" |
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रोज़ हम मार खाएँ, अरे बाप रे! जान कैसे बचाएँ, अरे बाप रे! इम्तहानों के दिन आने वाले हैं फिर फ़ेल हम हो न जाएँ, अरे बाप रे ! हम को इनसान बनने को भेजा गया और वो मुर्गा बनाएँ, अरे बाप रे ! लिखने वालों ने मुश्किल किताबें लिखी और हम पिटते जाएँ, अरे बाप रे! ऐसा लगता ओए जैसे कि खा जाएँगी मैडमों की अदाएँ , अरे बाप रे! हम गधों की तरह बोझ लादे हुए रोज़ स्कूल जाएँ, अरे बाप रे ! पिट के आते हैं स्कूल से और फिर घर पे भी मार खाएँ , अरे बाप रे! |
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