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| 05.31.2008 |
| न रोक पाई मेरी आस्तीन की खुश्बू डॉ. फ़रियाद "आज़र" |
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न रोक पाई मेरी आस्तीन की खुश्बू
उसे भी ले गई बहला के बीन की खुश्बू गुलाब उगे थे मेरे शहर के हर आँगन में मगर फज़ा में थी छाई मशीन की खुश्बू मेरे वजूद का मुझ को दिला गई एहसास मेरे गुमान से लिप्टी यक़ीन की खुश्बू न जाने कौन सी मिट्टी पड़ी थी गमलों में गुलाब देने लगे यासमीन की खुश्बू मैं आसमान पे पहुँचा मगर सताने लगी मेरे वजूद से लिप्टी ज़मीन की खुश्बू बस एक आन में सारे जहां में फैल गई बुतों के शहर से उभरी जो दीन की खुश्बू |
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