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| 05.31.2008 |
| खत जो काजल की लकीरों से लिखा होता है डॉ. फ़रियाद "आज़र" |
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खत जो काजल की लकीरों से लिखा होता है
डस्टबिन में वो कहीं आ के पड़ा होता है आज तक मैं ये समझ पाया नहीं शहरों में रंग क्यों फूलों की खुश्बू का उड़ा होता है उस को ये शर्म कि पढ़ लूँ न मैं सूरत उसकी जिसके चेहरे पे मेरा नाम लिखा होता है मुंतज़िर कौन अज़ल से है किसी राही का रोज़ पीपल के तले दीप जला होता है मह्फ़िलों में ही बिखरते हैं तबस्सुम "आज़र" मुंतज़िर घर पे कोई दर्द पड़ा होता है |
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