| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
| जबीं पर जिस के मेरा नाम है वो घर नहीं पाया डॉ. फ़रियाद "आज़र" |
|
जबीं पर जिस के मेरा नाम है वो घर नहीं पाया
मेरी आँखों ने अब तक ख्वाब का मंज़र नहीं पाया सभी को ज़हर अपने अपने हिस्से का पड़ा पीना नई तहज़ीब ने शायद कोई शंकर नहीं पाया तुम्हारी बेहिसी से रूठ कर सोचा था मर जाऊँ मैं शर्मिन्दा बहुत हूँ शायद अब तक मर नहीं पाया बहुत उकता के आया था वो खालीपन से अन्दर के जो देखा गौर से उसने तो कुछ बाहर नहीं पाया वगर्ना तुम मेरे हमदर्दों में शामिल नहीं होते तुम्हारे हाथों ने शायद कोई पत्थर नहीं पाया यहाँ के पत्थरों को देख कर मह्सूस होता है तुम्हारे शहर ने शायद कोई “आज़र” नहीं पाया |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|