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| 05.31.2008 |
| हद्दे-नज़र तक अपने सिवा कुछ वहाँ न था डॉ. फ़रियाद "आज़र" |
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हद्दे-नज़र तक अपने सिवा कुछ वहाँ न था
मैं वो ज़मीन जिसका कोई आसमां न था सब में किरायेदारों के पाये गए निशां जिस्मों के शहर में कोई खाली मकां न था बचपन के साथ हो गए बूढ़े तमाम ज़ेह्न हम मुफ़्लिसों के घर में कोई नौजवां न था चेहरे सभी के लगते थे मेहमानों से मगर खुद के सिवा किसी का कोई मेज़बां न था लज़्ज़त न मिल सकी मेरी तहज़ीब को कभी वर्ना मेरे गुनाह का मौसम कहाँ न था? उन ख्वाहिशों की छाँव में गुज़री तमाम उम्र जिन ख्वाहिशों के सर पे कोई सायबां न था |
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