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06.22.2008
 
बे रहम सच ने इतना डराया तमाम उम्र
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

बे रहम सच ने इतना डराया तमाम उम्र
देखा न हम ने ख़्वाब का चेहरा तमाम उम्र

नबियों का सिलसिला भी उसे रोकना पड़ा
सुधरी नहीं गुनाह् से दुनिया तमाम उम्र

बचपन में अपने साथ रहा, मैं जहाँ रहा
फिर मैं भी खुद को ढूँढ न पाया तमाम उम्र

मजबूरियों का नाम रखा ज़िन्दगी ने सब्र
फिर उस के बाद फल की तमन्ना तमाम उम्र

इक घर का ख़्वाब आँखों ने देखा ज़मीन पर
बनता रहा यालों में नक़्शा तमाम उम्र

वर्ना तो कितने लोग मुलाकातियों में थे
मुझ से वही मिला जो न बिछड़ा तमाम उम्र

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