दीवान
अजीब अन्दाज़ की ये
ज़िन्दगी
कर के बेदर्द ज़माने के हवाले मुझ को
क्या पता उस को कि वो मुझ को सज़ा देता है
खत जो काजल की लकीरों से लिखा होता है
खु़द अपना बारे-गम ...
जबीं पर जिस के मेरा नाम है वो घर नहीं
पाया
जाओ शीशे का बदन ले के किधर जाओगे?
ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ थीं बहुत
तपते सहरा में समुन्दर नहीं आने वाला
न रोक पाई मेरी आस्तीन की
खुश्बू
पड़ा था
लिखना मुझे खुद ही मर्सिया मेरा
बे रहम सच ने ...
शबनमी
धूप के आँगन में मिलेगी मुझको
सुबह होती है तो
दफ़्तर में बदल जाता है
सुराग भी
न मिले अजनबी सदा के मुझे
हद्दे-नज़र तक अपने
सिवा कुछ वहाँ न था
हवा-ए-शहर यहाँ किस
तरह चली बाबा
बाल-साहित्य