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05.04.2008
 

उड़ान
फ़ज़ल इमाम मल्लिक


उसने आँखें खोलीं तो दुनिया उसे बहुत अच्छी लगी। खुला-खुला आकाश और लंबी चौड़ी धरती ने उसे अपने सम्मोहन में जकड़ा। उसने अपने पंख खोल कर आकाश की लंबाई को नापना चाहा तो बड़े-बूढ़ों ने उसे समझाया, इतनी जल्दी उड़ान भरनी अच्छी बात नहीं है। धीरे-धीरे..... क़दम दर क़दम..... चलना सीखो और जब दुनिया पूरी तरह समझ में आजाए तो पूरी तरह पंख खोल कर उड़ान भरो।

पर उसे यह बात अच्छी नहीं लगी..... और उसने बुजुर्गों की बातों को झुठलाने के लिए लंबी उड़ान भरी..... लेकिन थोड़ी देर बाद ही वह धरती पर पड़ा था.....।


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