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04.06.2008
 

सपना
फ़ज़ल इमाम मल्लिक


घर वालों के विरोध के बावजूद उसने अपना घर बसाने के लिए उसका हाथ थाम और अनजान डगर पर पाँव धर दिये। घर वालों ने उसे बहुत समझाया पर घर का सपना उसकी आँखों में बसा था और हर सूरत में अपने सपनों को सच करना चाहती थी....।

बरसों बीत गए हैं। जिस डगर पर क़दम रख कर उसने घर बसाने का सपना देखा था, वह डगर बीच में ही अनजान रस्तों पर मुड़ गई थी। उसका सपना आज भी अधूरा है और वापसी के सब दरवाज़े उस पर बंद हैं।


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