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03.19.2008
 

रोशनी
फ़ज़ल इमाम मल्लिक


छोटा सा उसका घर शायद ही कभी पूरी तरह रोशन हुआ हो..... कभी एक कोना रोशन तो दूसरा अँधेरे में डूब जाता..... लेकिन इसके बावजूद उसके होंठों पर हमेशा एक सकून भरी मुस्कुराह्ट खेलती रहती..... उसके भीतर रोशनियों की एक दुनिया आबाद थी।


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