अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.04.2008
 

घर
फ़ज़ल इमाम मल्लिक


घरों से उसे बचपन से ही बेइंतहा प्यार था। आड़े-तिरछे नक्शे खींचना और घरौंदे बना कर उसे तोड़ना और फिर बनाना उसका बेहतरीन शग़ल था। बड़े होने पर भी घरों से उसका प्यार नहीं छूटा। आज शहर का वह माना हुआ आर्टिटेक्ट था..... शहर की की आलीशान इमारतें उसने बनाई थीं.... घरों में रंगो-रोग़न से लेकर नक्क़ाशी में भी वह अपनी पूरी महारत झोंक देता....।

दूसरों का घर बनाने के लिए वह पागलों की तरह दिन-रात एक किए रहता और घर बनने के बाद जब वह उसे देखता तो एक गर्व की हँसी उसके होंठों पर खेलने लगती....।

इस काम में दिन, महीने और साल इस तरह गुज़रे कि उसे कुछ पता ही नहीं चला...

काफ़ी सम बीतने के बाद जब उसे एक घर की ज़रूरत महसूस हुई तो उसे पता चला कि वक़्त उसकी मुट्ठियों से न जाने कब का फिसल चुका है..... दूसरों के घरों के जनून में वह इतना दूर निकल गया था कि उसे अपना घर बनाने की सुध ही नहीं रही। आज उसके रहने के लिए चारदीवारी तो है, घर नहीं.....।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें