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02.26.2008
 

अँधेरा
फ़ज़ल इमाम मल्लिक


रोशनी छलने लगी थी और अन्याय का बोलबाला था। उजाले अब बेतरह डराने लगे थे.... पता नहीं कब, कहाँ क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता... उसने बहुत सोचा...विचारा.... और फिर अँधेरा कर डाला। अँधेरा उसे अब रास आने लगा है।


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