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10.29.2007
 
सच्ची खुशी
डॉ. फकीरचंद शुक्ला

चीचू चूहा जब पाँचवी कक्षा में से पास हुआ तो उस के पिता जी ने साइकिल ले दी। वह हर समय साइकिल पर इधर उधर घूमता रहता।

एक दिन चीचू चूहा बहुत तेज साइकिल चलाये जा रहा था। ज्यों ही वह मोड़ के निकट पहुँचा तो अचानक टमटम मेंढक सामने आ गया। चीचू ने झटपट ब्रेक लगाई। पर साइकिल रुकी नहीं तथा टमटम के ऊपर से निकल गई। बेचारा टमटम बुरी तरह घायल हो गया।

चीचू साइकिल वहीं पर छोड़ कर सीधा घर की ओर भागा। घर पहुँच कर उसने सारी बात अपने घर वालों को बतला दी। उनके तो मारे डर के पसीने छूटने लगे। उन्होने झटपट घर के सारे दरवाजे,खिड़कियाँ तथा रोशनदान बंद कर दिये तथा अपने बचाव के लिये कोई ढंग सोचने लगे।

इस से पहले कि चीचू परिवार अपने बचाव के लिए कोई ढंग सोच पाता, झील के सारे मेंढक बन्दूकें, तलवारें तथा भाले लिये वहाँ आ पहुँचे और लगे जोर जोर से ललकारने- अबे ओ चीचू के बच्चे, अब बिल में क्यों छुप गया है? हिम्मत है तो इक बार बाहर निकल आ। तेरे और तेरे घर वालों के टुकड़े टुकड़े न कर दिये तो हमारा नाम भी मेढक नहीं।

जब बहुत चीखने चिल्लाने पर भी चीचू परिवार बिल से बाहर न निकला तो मेंढकों ने भी यह कहते हुये वहीं डेरे लगा दिये -कोई बात नहीं कभी तो बाहर निकलोगे ही तब देखेंगे तुम्हे कौन बचाता है हमारे हाथों से।

इसी तरह तीन दिन गुजर गये। न तो मेढकों की सेना ही वहाँ से हटी और न ही चीचू परिवार बिल से बाहर निकला यद्यपि भूख और प्यास के कारण चूहों का दम निकला जा रहा था। लेकिन फिर भी मेंढकों की सेना की मार के डर से वे बाहर न निकले।

जंगल के सभी पशु पक्षियों ने मेंढकों की बहुत खुशामदें कीं लेकिन उन के कानों पर जूँ तक नहीं सरकी।

मेंढकों और चूहों की इस शत्रुता के कारण सारे जंगल में उदासी छा गई।

आखिर जंगल वासियों ने एक मीटिंग बुलाई। सभी ने अपने अपने विचार व्यक्त किये कि किस तरह मेंढक और चूहों  की सुलह करवाई जाये। अन्त में यह फैसला सर्वसम्मति से पास हुआ कि अब केवल एक ही महानुभाव है जो चूहों और मेंढक में सुलह करवा सकते हैं और वह है डाक्टरबन्दर।  

बस उसी समय खरगोश हवाई जहाज में सवार होकर शहर की ओर चल पड़ा। सब को पूरा विश्वास था कि मेंढक डाक्टरबन्दर की बात को इन्कार नहीं कर सकेंगे क्योंकि जाड़े के मौसम में जब झील के सभी मेंढकों को निमोनिया हो गया था तब डाक्टरबन्दर ने ही उनकी जान बचाई थी।

कुछ समय पश्चात डाक्टरबन्दर भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने एक सरसरी नज़र सभी पर फेंकी। फिर बड़े ही शान्त स्वर में बोले- मेंढक भाईयो मुझे यह जानकर बेहद दुख हुआ कि आप लोगों ने जंगल वासियों की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया। यह आप लोगों ने अच्छा नहीं किया। अगर चीचू से गल्ती हो गई थी तो उसे समझा सकते थे या शेर महाराज से शिकायत कर सकते थे। इस तरह मार पिटाई वाली कौन सी बात हो गई थी।

सभी मेंढक सिर झुकाये बैठे डाक्टरबन्दर कहे जा रहे थे- देख रहे हो न। तुम्हारे ही कारण आज सारे जंगल में उदासी छाई हुई है। शायद तुम नहीं जानते जो खुशी किसी को माफ करने पर मिलती है वह बदला लेने पर कभी भी नहीं मिलती।

बात मेंढकों की समझ में आ गई। डाक्टर बन्दर के कहने पर चीचू परिवार बिल से बाहर निकल आया और उन्होंने मेंढकों से माफी मांगी।

मेंढकों ने चूहों को माफ कर दिया था,यह देख कर जंगलवासी खुशी से झूम उठे। जंगल में पहले की तरह चहल पहल हो गई।

जब मेंढकों ने जंगलवासियों को इस तरह नाचते कूदते देखा तो उनके मुँह से अपने आप ही निकल पड़ा- डाक्टर बन्दर सच ही कहते हैं। जो खुशी किसी को माफ करके मिलती है वह बदला लेने पर कभी भी नहीं मिलती।


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