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10.29.2007
 
कुत्ते की पूँछ
डॉ. फकीरचंद शुक्ला

 

वह पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौकीन है। हर समय किताबों में ही खोया रहता है।

मगर वह किसी कोर्स की पढ़ाई नहीं कर रहा। इस तरह की जो पढ़ाई करनी थी, कब की पूरी कर चुका है। कोर्स की किताबों में उसकी रुचि कम ही थी। पढ़ने के लिए तो उपन्यास, कहानी संकलन या मैगज़ीन ही उसे रुचिकर लगते थे और अब भी लगते हैं।

खाना खाते समय भी कोई पुस्तक या मैगज़ीन सामने खोले रखता। रात को बिस्तर पर जाने से पहले भी जब तक एक दो कहानियाँ न पढ़ लेता उसे नींद न आती।

जब कुँवारा था तो रात को न जाने कितने बजे तक पढ़ता रहता। हाथ से घड़ी उतार कर रख दिया करता ताकि समय का पता न चले और इस तरह कहानी पढ़ने का मजा किरकिरा न हो पाये।

सेंट्रल लाइब्रेरी का मेम्बर है वह। हर दूसरे -तीसरे दिन पुरानी पुस्तकें लौटा कर नयी निकलवा लाता है। पढ़ने की उसकी स्पीड से लगता है जैसे वह कोई बहुत बड़ा स्कालर हो तथा उपन्यास या कहानी विधा पर शोध कर रहा हो। लाइब्रेरी का कार्ड भी तेजी से भरता जा रहा है। एक बार लाइब्रेरी में पुस्तकें इशू करने वाले ने पूछ ही लिया था- आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ?”

 कहिये

 क्या आप सचमुच ही इतनी जल्दी किताबें पढ़ लेते हैं? अन्यथा न लें मैं तो बस...

प्रत्युत्तर में हल्का- सा मुस्करा कर उस ने कहा था, “बस यूँ ही समझ लीजिएगा पर अपने मन में इतना अवश्य सोचा था कि यह तो कुछ भी नहीं। कालेज के दिनों में तो इस से दोगुनी स्पीड से पढ़ लिया करता था

यार दोस्त भी उसकी इस आदत पर कटाक्ष किए बिना नहीं चूकते,  “न्यूटन साहिब, दफ़्तर के साथी उसे इसी नाम से बुलाते हैं,  अगर आप इतना ध्यान डिपार्टमेंटल एग्जाम पर लगायें तो आपका कैरियर बन जाये। यूँ आँखें खराब करने से क्या लाभ?”

उसे उनकी बात बुरी नहीं लगती। न कभी गुस्सा आता उन पर। मन ही मन हँसता है अगर इन्हें मालूम हो जाये कि वह तो लैट्रिन में भी मैगज़ीन साथ लेकर जाता है तब तो शायद उसका जीना दूभर कर दें।

वह एक सरकारी दफ्तर में कलर्क की पोस्ट को सुशोभित किये हुए है। दफ्तर में भी अपनी इस आदत पर वह नियन्त्रण नहीं कर पाया। साहिब ने भी कई बार समझाया। मगर उस पर जैसे ज्यादा देर असर नहीं रह पाता। दफ्तर का काम वह फुर्ती से निबटा देता और समय मिलते ही मैगज़ीन निकाल कर पढ़ने लग जाता। साहिब ने भी , शायद तंग आकर, रोक टोक बंद कर दी थी। भाड में जाये। उन्हें क्या,  दफ्तर का काम तो ठीक से करता है।

पत्नी भी उसकी इस आदत से परेशान है। यह भी कैसा शौक। न खाने-पीने की सुध, न पहनने का चाव। सामने थाली में पड़ा खाना ठंडा हो जायेगा, मगर जनाब की नज़रें पुस्तक पर से नहीं हट सकतीं।

पत्नी भी अपनी ओर से पूरा जोर लगा कर थक गई। न तो प्यार से समझाने का कोई असर हुआ और न ही रूठने का फार्मूला काम आया।

उस दिन पत्नी रसोई में चाय बना रही थी। पतीली उठाते समय अचानक हाथ से छूट गई और खौलते हुए पानी के छींटे पाँव पर जा पड़े।

 हाय मैं मर गई... पत्नी की चीख निकल गई।

वह कमरे मैं बैठा उपन्यास पढ़ रहा था। उपन्यास का कथानक कलाईमैक्स पर था। पत्नी की चीख सुनकर उसने बिना पुस्तक से नज़रें उठाये ही पूछा-क्या हुआ?”

पत्नी की ओर से कोई जवाब नहीं आया।

एक बार पूछने के पश्चात फिर से आवाज़ देने की शायद उसने आवश्यकता नहीं समझी, या उसे ध्यान ही नहीं रहा। पत्नी स्वंय ही कमरे में चली आयी।

पति को किताब पढ़ते देख वह आग बबूला हो उठी- हद हो गई। कोई मरता है तो मरे इन्हें किताबों से फुरसत नहीं। अगर पुस्तकों से इतना ही लगाव था तो क्या ज़रूरत थी शादी करवाने की?”

पत्नी ने उस के हाथ से किताब झपट कर परे फेंक दी। वह स्तब्ध रह गया। अपलक पत्नी की ओर देखने लगा। पत्नी का चेहरा क्रोध से तिलमिला रहा था।

बाप रे इतना गुस्सा कह कर वह हल्का- सा मुस्कुराया और कुर्सी की पीठ से पीठ लगा कर थोड़ा लेट गया। पत्नी क्यों चीखी थी उसे बिलकुल याद न रहा।

पत्नी ने एक बार घूर कर उसकी ओर देखा। फिर अलमारी में से बरनोल निकाल कर पाँव पर मलने लगी।

 क्या हुआ ?” उसने आश्चर्यचकित हो पूछा।

 क्या करोगे जानकर? अपनी किताब पढ़ते रहो कह कर वह फिर अन्दर वाले कमरे में चली गई।

वह सोचने पर विवश हो गया। क्या हो गया है पत्नी को? बेवजह नाराज़ा हो जाती है। किताब को ऐसे फेंक दिया जैसे घर की ही कोई चीज़ हो। फट जाती तो नयी लेकर देनी पड़ती। कितना दिलचस्प कथानक चल रहा था। सारा मज़ा किरकिरा कर दिया। अब तक तो पाँच दस पृष्ठ और पढ़ लिए होते। रसोई में काम करते समय घी का मामूली छींटा पड़ गया होगा। फिर भी औरत जात है। जल्दी घबरा जाती है।

वह कुर्सी से उठा और कमरे के एक नुक्कड़ से पत्नी द्वारा फेंकी पुस्तक उठा लाया तथा उसे फिर से पढ़ना शुरू कर दिया। शाम तक यह उपन्यास समाप्त हो जाये तो लाइब्रेरी बंद होने से पहले उसे लौटा कर कोई अन्य पुस्तक ले आयेगा, उसने सोचा।

कुछ देर बाद पत्नी की आवाज़ आई-मैं जा रही हूँ।

 अच्छा बिना नज़रें ऊपर उठाये ही उसने जवाब दिया।

 यह भी नहीं पूछना कि कहाँ जा रही हूँ?”

पत्नी के ऐसा कहने पर उस ने गर्दन उठा कर पत्नी की ओर देखा हैं   यह अटैची किस लिये? मैं तो समझा था कि तुम...

बाजार जा रही हूँ, यही न..?” पत्नी ने बीच में ही बात काट दी- जी नहीं, मैं बाजार नहीं मायके जा रही हूँ।

 मगर क्यों?”

 यह भी बतलाने की आवश्यकता है?” और वह दरवाजे की ओर मुड़ी।

 बात तो सुन वह एकदम उठ खड़ा हुआ।

 जाने दीजिए बेकार में आपका समय नष्ट होगा। इतनी देर में तो आप दो चार पृष्ठ और पढ़ लेंगे।

और अगले ही पल वह दरवाजे के बाहर थी।

वह स्तब्ध- सा उसे जाते देखता रहा। उससे इतना भी नहीं हुआ कि आगे बढ़कर उसके हाथ से अटैची छीन ले और बाजू से पकड़ कर उसे अन्दर ले आये।

०००    ०००    ०००

पत्नी को गये पन्द्रह दिन के लगभग होने को हैं। ये दिन उसने कैसे काटे, बस वही जानता है। हर समय न जाने किन खयालों में खोया रहता है। पुस्तकें पढ़नी भी छोड़ दी हैं। पत्नी का यूँ रूठ कर चले जाना उसके लिए असह्य हो गया है।

अपनी भूल स्वीकार कर पत्नी को पत्र लिखना उसे अपना अपमान लगता है- अपनी मर्जी से गई है, अपने आप ही आये।

कई दिनों से वह दफ्तर भी नहीं जा पाया। बीमारी ने उसे अपने बाहुपाश में ले लिया है- सम्भवतःमौसम में आ रहे परिवर्तन के कारम या समय पर भोजन न मिल पाने से।

शाम को जब वह डाक्टर से दवाई लेकर घर लौटा तो पत्नी को घर में आया देख कर खुशी से खिल उठा।

तबीयत कैसी है...? बुखार कैसे आ गया...?” उसके कुछ पूछ पाने से पहले ही पत्नी ने पूछ लिया।

उसे हैरानी हुई। पत्नी को कैसे पता चला।

मुझे मिसेज शर्मा का फोन आया था। आप के बारे में उसने बताया। फोन सुनते ही मैं तो तुरन्त चल पड़ी पत्नी ने जैसे उसे वास्तविकता से परिचित करवा दिया।

पत्नी के लौटने की खुशी के अतिरिक्त उसे इस बात की भी खुशी हुई कि उसे झुकना नहीं पड़ा। अपने आप गई थी, अपने आप ही लौट आई।

इधर उधर की बातें चलती रहीं। आखिर पत्नी ने पूछ ही लिया-आज किताबें और मैगज़ीन नज़र नहीं आ रहे... क्या बात है?”

 तुम जो रूठ गई थी। मैंने तो उसी दिन सब किताबें और मैगज़ीन बाहर फेंक दिये। लाइब्रेरी का कार्ड भी कैंसिल करवा दिया।

 सच..?” पत्नी को जैसे विश्वास न हुआ।

 तुम्हारी कसम

पत्नी खुशी से खिल उठी। मन ही मन उसने स्वयं को बुरा भला कहा। बेकार में ही पति से झगड़ा करती है। वह तो उसकी हर बात मानता है।

पति का बुखार भी जैसै छूमन्तर हो गया। पत्नी ने उसकी मन पसंद डिश मटर चावल बनाये। दोनों एक ही प्लेट में खाने लगे। चम्मच भर भर कर पत्नी उसके मुँह में डालती और वह पत्नी के।

खाना समाप्त हुआ। रात काफी घिर आई थी। वे चारपाई पर जा लेटे। इधर उधर की बातें करने लगे।

अचानक पति ने तकिये को एक ओर थोड़ा- सा सरका कर एक मैगज़ीन उठा ली।

 यह क्या  आप तो कहते थे...?” पत्नी आश्चर्यचकित हो उस की ओर देखने लगी।             आज मत रोकना प्लीज़ वह जैसे खुशामद करने लगा- आज तो तुम्हारे आने की खुशी में दो चार पेज पढ़ना चाहता हूँ। कल से बिलकुल नहीं पढूँगा, तुम्हारी कसम डार्लिंग और पहले की तरह ही उसने अपनी नज़रें मैगज़ीन के पन्नों पर जमा दीं।  



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