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बेशक बचा हुआ कोई भी उसका पर न था
हिम्मत थी हौसला था परिन्दे को डर न था
धड़ से कटा के घूमते हैं आज हम जिसे
झुकता कभी ये झूठ के पैरों पे सर न था
कदमों की धूल चाट के छूना था आसमान
थे हम भी बाहुनर मगर ऐसा हुनर न था
भूला सहर का शाम को लौटा तो था मगर
जाता कहाँ वो घर में कभी मुन्तज़र न था
सूरज का एहतराम किया उसने उम्र भर
जिसका कहीं भी धूप की बस्ती में घर न था
उसने हमें मिटाने को माँगी ज़रूर थी
यह और बात है कि दुआ में असर न था
मंज़िल हमारी ख़त्म हुई उस मुक़ाम पर
सहरा की रेत थी जहाँ कोई शजर न था.
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