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06.22.2008
 

बेशक बचा हुआ कोई भी उसका पर न था
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


बेशक बचा हुआ कोई भी उसका पर न था
हिम्मत थी हौसला था परिन्दे को डर न था

धड़ से कटा के घूमते हैं आज हम जिसे
झुकता कभी ये झूठ के पैरों पे सर न था

कदमों की धूल चाट के छूना था आसमान
थे हम भी बाहुनर मगर ऐसा हुनर न था

भूला सहर का शाम को लौटा तो था मगर
जाता कहाँ वो घर में कभी मुन्तज़र न था

सूरज का एहतराम किया उसने उम्र भर
जिसका कहीं भी धूप की बस्ती में घर न था

उसने हमें मिटाने को माँगी ज़रूर थी
यह और बात है कि दुआ में असर न था

मंज़िल हमारी ख़त्म हुई उस मुक़ाम पर
सहरा की रेत थी जहाँ कोई शजर न था.


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