द्विजेन्द्र द्विज


दीवान

अश्क़ बन कर जो ...
आइने कितने यहाँ टूट चुके
कटे थे कल जो यहाँ
जाने कितने ही उजालों का
ज़ेह्न में और कोई डर नहीं
जो पल कर आस्तीनों में
देख, ऐसे सवाल रहने दे
न वापसी है जहाँ से
नये साल में
पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन
बेशक बचा हुआ कोई भी
यह उजाला तो नहीं
ये कौन छोड़ गया इस पे
सामने काली अँधेरी रात
हुज़ूर, आप तो जा पहुँचे