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10.18.2007
 
मैंने इक सपना देखा था
दिवाकर

मैंने एक सपना देखा था..
कोई मेरे साथ हो जैसे
महकी महकी रात हो जैसे
जैसे दिल में फूल खिले हों
जैसे बरसों बाद मिले हों
जैसे कोई चाँद का टुकड़ा
दिल में मेरे उतर गया हो
जैसे लाली बिखर गई हो
उगते सूरज की धरती पर
जैसे बाली खनक रही हो
किसी दीवानी के कानों पर
जैसे ढलती शाम सुहानी
जैसे कोई प्रीत पुरानी
जैसे लहरों का लहराना
मैं कोई पागल दीवाना
उसकी बाहों में खोया हूँ
जाग रहा हूँ पर सोया हूँ
उसका बालों को सहलाना
मीठी बातों से बहलाना
धीरे धीरे कोई पुराना
प्यार भरा गीत सुनाना
उसकी बातें दिल में मेरे
गहरे गहरे उतर रही थीं
उसकी साँसों की खुशबू से
मेरी साँसे महक रही थीं
उसके उलझे बालों का वो
मेरे चेहरे से टकराना
जैसे सावन के बादल का
तपती धरती को ललचाना
उसकी पलकों का वो हिलना
जैसे धरती डोल रही हो
उसकी आँखों का खुलना
जैसे वो कुछ बोल रही हो
आँख खुली तो कोई नहीं था
दरवाज़ा पर खुला हुआ था
उसके सपनों का आँखों मैं
अमृत अब तक घुला हुआ था
कमरे में आहट थी कोई
जैसे कोई घूम रहा था
पास मेरे धीरे से आ कर
छू कर मुझे बोल रहा है
इन झूठी नज़रों से मुझको
तुम महसूस ना कर पाओगे
जब भी आँखें बन्द करोगे
मुझको पहलू में पाओगे


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