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| 11.29.2007 |
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प्रतिक्रिया - "चन्दन-पानी"
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दिव्या
के खयालों की एक अपनी ही तहज़ीब है,
एक
अपना ही अंदाज़ है,
एक
अपना ही मिज़ाज़ और लहज़ा है। उनका बिंब विधान सहज व स्वानुभूत यथार्थ से
अभिप्रेरित होने के साथ साथ संगीतात्मक लय से भी संपन्न है। जीवन के
सुखों और दुखों को छोटे छोटे शब्दचित्रों में प्रस्तुत करने में उनकी
कविताऐं सक्षम हैं। डा लक्ष्मी मल्ल सिंघवी
दिव्या का काव्य सृजन संस्कृति को सहेजने का एक खूबसूरत माध्यम है और
चंदन पानी उसी का सार्थक प्रतिफल है,
रचनाकार की दृष्टि की व्यापकता के साथ साथ उसके मर्म के फलक का भी
अनायास ही पता चल जाता है।
पवन
कुमार वर्मा
दिव्या का विधान सहज व स्वानुभूत यथार्थ से अभिप्रेरित होने के साथ साथ
संगीतात्मक लय से भी संपन्न है।
गंगाप्रसाद विमल
डा
कमल किशोर गोयनका
वंशी
माहेश्वरी,
संपादक,
तनाव
विजय
रंजन,
संपादक,
अवध
अर्चना
अनिल
शर्मा
‘जोशी‘
दिव्या की कविता गहरी बात को सीधी सादी भाषा में कहने की क्षमता रखती
हैं- समुद्र की गहराइयों को महसूस किया जा सकता है,
लहरों
की आवाज़ सुनी जा सकती है और शोर मचाती खामोशी को छुआ जा सकता है।
शिरीन
इज़ाल |
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