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11.29.2007
 

अन्त्येष्टि - कुछ भाव
दिव्या माथुर


कफ़न
बर्फ़ के पैसे बचा
बेटा ले तो आया है
किंतु कब तक
ये धूपबत्ती संभाल पाएगी दुर्गंध
विधवा के मन में
चल रहा है ये द्वंद
सोच रहा है बेटा उधर
पिता के मृत शरीर पर
यदि फटी धोती
डाली जा सकती
तो ख़रीद लाता वह
माँ के लिए एक धोती सस्ती।


करवट
लंबी काली कार पर
सजा दिए गये हैं
फूलों से लिखे संदेश
‘लव यू पापा’
‘मिस यू ग्रैंड डैड’
‘फ़ेयर दी वैल हब्बी’

शवपेटिका में लेटे
करवट बदल रहे हैं
वही दादा जो
जीवन भर
ग़ुलामी के विरुद्ध खटे।

कुट्टी
काली टाई लगाये
दस वर्षीय पोता
माँ से ज़िद कर रहा है
शवपेटिका को खोलने की
भला उसके दादा
इतनी देर कैसे चुप रह सकते हैं
काला रिबन और
नई काली फ्रॉक पहने
पिता की अँगुली थामें
सहमी सी चल रही है पोती
अपने दादा से उसने
कल ही तो कुट्टी की थी।

नुमाइश
काले क्रिस्प सूट पहने बेटे
मेहमानों की खातिर में लगे हैं
सिल्क की साड़ियाँ पहने बहुऐं
अपने चमकते हीरों की
नुमाइश में लगीं हैं
बिचका के मुँह
किसी ने कहा
एक दिन के लिए
इतने महँगे हीरे लेने का क्या फ़ायदा
बहु ने खटाक से जवाब दिया
पर हीरे तो हर मौके पर
पहने जा सकते हैं।

शिष्टाचार
नई नवेली विधवा
पड़ौसिनों से घिरी बैठी है
काली सिल्क की
नई साड़ी में लिपटी
असहज
‘कैसी हो?’
‘आल राइट?’
‘केम छो?’
के प्रश्नों के भँवर में
डूबती उबरती
‘हाँ’ में सिर हिलाती है तो
पाती है कि वह ज़िंदा है।

तेरहवीं
सफ़ेद और लाल शराब में
तैरते लोग अपनी अपनी
चपर चपर में लगे हैं
तरह तरह के पकवान सजे हैं
‘अरे कोई मृतक को भी याद कर लो’
दिल्ली से आई ताईजी ने कहा

कँधे उचका कर
लोग इधर उधर हो लिए
बहू ने लपक कर भरे दिये में
कुछ और घी डाल दिया
बेटे ने जगजीत सिंह के भजनों की
टेप लगा दी।


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