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11.29.2007
 

बे वो काटा
दिव्या माथुर


नभ की सैर को चली पतंग
राँझे को अपने ले संग
बेहद देख हुई वह दंग
छिड़ी वहाँ थी ऐसी जंग
पहले लगा, थी वह सिर्फ़ होड़
रंग बिरंगी भीड़, शोर
प्रतिस्पर्द्धा थी वहाँ घोर पर
इस जोड़े का था नहीं तोड़

न जाने कहाँ शुरुआत हुई
हाथापाई तक आ पहुँची
अस्त्रों - शस्त्रों की धूम मची
भगदड़ में हीर कहीं उलझी
युद्ध का जब ऐलान हुआ
तो आसमान मैदान हुआ
धरा में छाया धूल-धुआँ
मारो काटो का शोर मचा
धरती की छल-बल रणनीति
नभ की कितनी अस्मतें लुटीं

फैल गई सनसनी घनी
हीर कैसे कब तक बचती
अपहरण हीर का न देखा गया
दिल राँझे का यूँ चाक हुआ
खुद घायल था पर लड़ता रहा,
कोई बीसियों को वह मार गिरा
इक दूजे में उलझे हुए
आ धरा पे दोनो संग गिरे
प्रतिपक्षी आ आपस में भिड़े
दर्शकों के तंग घेरे में घिरे

कुछ देर रहा इक सन्नाटा
फिर शोर उठा, ‘बे वो काटा’


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