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11.29.2007
 

बार्कले स्क्वैयर के सुनहरी पत्ते
दिव्या माथुर


बार्कले स्क्वैयर भर गया है
सुनहरी पत्तों से
बीते बरस बिखरे पड़े हैं
मकड़ी के छत्तों से
कुछ अब भी टँगे हैं डालों पर
इक हाथ पे लटके बंदर से
कुछ कमर कसे हैं जाने को
दुनिया से मस्त कलंदर से
बैठे हैं थामें हाथों में
एक बूढ़ा भूरा पत्ता
आँखों में इल्तजा लिए
अभी न जाओ तुम अक्का
चक्कर से निकलूँ मैं इनके
अपना रस्ता ढूँढें ख़ुद ये
प्राण त्यागने हैं मुझको
‘हे राम’ निकलते ही मुख से
दो गज़ ज़मीन अब
ख़ुद के लिए तैयार करूँ
पाँव तले इन्हें जीवन í
चलूँ उठूँ


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